कहीं घुमावदार कहीं सरल तुम,
कभी मिट्टी के, कभी पथरीले,
मनोहर सब रूप तुम्हारे,
कहीं तुम श्यामल, कहीं रुपहले,
तुम्हारे अगुआई में ही हुई,
जीवन की हर यात्रा हमारी,
पथ के हर जटिल मोड़
पर,
सँवारा तुमने बनकर प्रहरी।
तुम्हारे समक्ष हुआ,
आक्रोश व अधिकार का हनन,
क्षणभर में बिखर
गया सुराज,
अनीति का हुआ प्रस्थापन,
मूक साक्षी तुम आंदोलन
के,
जिसने किया क्रांति का उद्दीपन,
तुम्हारी ही साक्ष से पुनः पुनः,
अनीति का हुआ उच्चाटन।
तुम भी नहाए हर्षित
परिमल,
किसीपर बरसे जो गौरव-सुमन,
भावुक भी हुए चढ़ाए पुष्प देख,
सुनकर अंतिम यात्रा के कथन,
गुलाल से सजे कपोल
तुम्हारे,
कहते विजय व सौहार्द के स्तवन,
कोई न जाने तुम्हारे
भीतर बसे,
अनगिनत आख्यानों के कवन।
तुम भी अनायास हो आते
हो तीरथ,
पंथियों के चरण स्पर्श से,
तुम्हारा चित्त भी
तन्मय होता,
मृदंग के उस मंजुल रव से,
तुम्हारे गुलाल सुमनों के परिधान,
तुम भी प्रतीत होते भक्त से,
प्रत्यक्ष दर्शन की अनुभूति,
करते पंथी के माध्यम से।
तुम्हारी गोद में ही
खेलकर,
स्वच्छंद झूमा मेरा शैशव,
तुम भी जिये विभोर
किशोर पल,
मेरे ऊर्जित यौवन पल्लव,
अस्त के आरक्त क्षितिज
की,
सँवारी तुमने संध्या नीरव,
हर पड़ाव की अनूठी शिक्षा,
जीवन का है सार अभिनव।
ग्रीष्म में आम्रवृक्ष
की छाया,
वसंत में ओढ़ा था बौर तुमने,
आषाढ की सब करते याचना,
तुम्हारे तप्त कण शांत करने,
सावन की झड़ी से तराबोर
तन को,
छेड़ा हेमंत के पतझड़ ने,
तीनों ऋतुओं के अमृत
से,
तृप्त किया है तुम्हें सृष्टि ने।
जब जब मेरा विवेक भटका,
तुमने ही दिखाई दिशा पनघट की,
सावधान करते रहे मोड़ोंपर,
वश में भी की गति आवेश की,
खोने न दिया धैर्य तनिक,
निकट थी जब पूर्ति ध्येय की,
जागने न दिया अहंकार किंचित्,
उत्तेजना में ध्येयप्राप्ति की।
तुम सदा रहते निडर,
चाहे जीवनमार्ग में हो कुछ अघटित,
डगमगाता न तुम्हारा
संयम,
यात्रा की मोड़ोंपर अनपेक्षित,
न अप्रिय भूत से होते खिन्न,
न भविष्य की चिंता कर विचलित,
परिचय बनते हो सरलता का,
वर्तमान को जीकर संतुलित।
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# Road, Path
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