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12 October, 2024

• दशानन

लालच ने निष्प्रभ कर दी,
तुम्हारी निःसीम उपासना,
ऐश्वर्य की शैय्या पर भी अस्वस्थ,
अधिक की निरंतर वासना,
अमर्याद सत्ता का निष्णात शासक,
किंतु सामर्थ्य की संतत याचना,
स्वर्ण को भी निस्तेज कर गई,
भौतिक की अनिर्बंध कामना।

तुम अवश्य भक्त थे, किंतु,
तुम्हारे अहंकार से भक्त की प्रतिमा हुई दीन,
तुम्हारे ज्ञान, बोध, शास्त्र, कला,
आज भी अभिमान के ही हैं अधीन,
तुम्हारे बल आज भी,
अबोध व निष्पाप की प्रताड़ना में हैं लीन,
व्यर्थ बहुआयामी व्यक्तित्व तुम्हारा,
व्यस्त जो समाजहनन में हीन।

शाप जो दिये गए थे तुम्हें,
आज सिद्ध होते हैं प्रभावहीन,
तुम्हारे किए से दुष्कृत्यों से स्तब्ध हैं,
परिभाषा व जीव हर शालीन,
तुम्हारे अनिर्बंध वर्तन की जयजयकार,
हो गई है अब रीति नवीन,
अप्रचलित हो चुके हैं आज,
सुनीति, सदाचार, सत्कर्म प्राचीन।

नाभीभेद से हुआ तुम्हारा अंत,
ढकोसला सिद्ध हुआ अंत में,
अनीति पर नीति का विजय,
प्रहसन सा प्रतीत होता आख्यानों में,
तुम्हारे कुकर्म रिसते रिसते,
स्थायी बन चुके हैं कुंठित समाज में,
पुनः पुनः जन्म ले कर तुम,
जीवन भरते आए हो विषवृक्ष में।

कल तक रंभा थी,
आज कोई और है पीड़िता,
तुम्हारे पश्चात भी,
अत्याचार किंतु नहीं मिटता,
विलाप व रुदन का आलेख,
अविरत आया है चढ़ता,
संभवतः तुम्हारे श्वास शाश्वत हैं,
तुम्हारी मृत्यु छल सा है लगता।

निर्भया, हाथरस, कठुआ,
तुम ही प्रत्येक घटना के सूत्रधार,
तुम्हारे एकाधिकार के समक्ष,
धूल चाटता नाभिभेद का चमत्कार,
उपहास बन गया है न्याय का अनुरोध,
सर्वत्र अन्याय व हाहाकार,
जाने कितनी करनी होगी प्रतीक्षा,
तुम्हारे अंत से करने साक्षात्कार।

■ विजयादशमी 

*****
# Vijayadashmi, Dussera, Rawan

22 January, 2024

• प्राण और प्रतिष्ठा

मंजुल ध्वनि कोमल घंटियों की,
प्रक्षोभ की कर्कशता में क्रमशः लुप्त होती,
उन्माद भरे विज्ञापन का कोलाहल,
घुट गई निःसीम भक्ति,
द्वेष की मानसिकता के दलदल में,
मानवता मानो श्वास है गिनती,
मेरे हृदय से प्रस्थान कर चले मेरे प्राण,
कि मेरे पापों की भंगुर नींव उनकी प्रतिष्ठा ढहाती।

उजड़े घर की बिखरी हुई मुंडेर,
माँ सजाती है छोटे से दीप से,
उसके प्राण आएँगे, आएँगे लेकर उजाले,
भोली, किंतु पूरी आशा है उसे,
सुना है वहाँ छप्पन भोग लगा है,
यहाँ मिट्टी की प्रतिष्ठा दाने-दाने को तरसे,
निर्लज्जता का कोलाहल सुनाई दे रहा है,
भग्नावशेष पर रचाए आलय से।

असंख्य आभूषणों से अलंकृत,
फिर भी निस्तेज हैं प्राण,
कि स्वार्थ के दावानल में,
भस्म हुए दायित्व के परिमाण,
धर्मांधता की मोहिनी से,
बधिर हुआ सत्य का परित्राण,
प्रतिष्ठा की सिसकियाँ दबाते,
एकाधीपत्य के निर्दयी पाषाण।

आज भी अनगिनत प्राण शक्ति के,
विवश हैं झुलसने को प्रताड़ना की ज्वाला में,
थक कर चूर, पराजित हो चुकी है प्रतिष्ठा,
स्वाभिमान और सम्मान की प्रतीक्षा में,
कुचले जा रहे हैं मूल्य, त्यक्त, लाचार, दुर्बल भी,
डोल रहा अहंकार, मिथ्या विजयोत्सव की ग्लानि में,
अशिष्ट हो रहे हैं श्रेष्ठ, आदर्श सहते हे हैं उपेक्षा,
नैतिकता हुई निश्चेष्ट, ऊँच-नीच के भेद में।

असंभव प्रतीत होती है सांप्रत,
क्रोध व ईर्ष्या से मुक्ति,
विचारधाराओं के द्वंद्व में,
भ्रष्ट हो चुकी है हमारी मति,
विषवृक्ष की जड़ें कुरेद चुकी हैं सद्विवेक,
विष-लता की बंदी बन चुकी है नीति,
प्राणों की प्रतिष्ठा लगी है दाँव पर,
प्रत्येक घड़ी अराजकता की आहट है लाती।
*****
# Temple, Mandir, Demolition, Dispute

29 September, 2019

• नवरात्रि

     भारत में नवरात्रि का त्योहार मनाने के तराइक़ मुख़्तलिफ़१ हैं; लेकिन इसका नाक़ाबिल-ए-तक़्सीम२ हिस्सा होता है एक मुख़्तसर मगर अज़ीम दीया। नौ दिनों तक शब-ओ-रोज़३ जलते दीये की सलीम४ लौ से फैलती रोशनी में फ़ज़ा आसूदा५ होती है। आरज़ू है, कि यह रोशनी हर शख़्स की ज़िंदगी अमन-ओ-सुकून से मुनव्वर६ करे।

हर लौ का पर्तोव७ बने, इस्तिलाह८ ग़ालिब हौसले की,

रोशन हों तारीक९ राहें, मन्फ़ी१० मिटे हर ज़िहन की,
फ़रोज़ाँ११ हो आलम इल्म१२ से, रहनुमाई में इल्मदाँ१३ की,
क़लम-ए-अदम-ए-तशद्दुद१४ लिखे, तहरीर मुस्तक़्बिल१५ की.

■ Navaraatri Greetings
(Select lines from my Hindi poetry book)
(Navaraatri is an Indian festival)

(१-various, २-inseparable, ३-day & night, ४-calm, ५-contented, ६-illuminate, ७-glow, ८-definition, ९-dark, १०-negativity, ११-illuminate, १२-knowledge, १३-scholar, १४-pen of non-violence, १५-future) 
*****

23 August, 2019

• कहाँ हो तुम कृष्ण

    ‘कृष्ण’ से जुड़ी कहानियाँ तो बचपन से सुनता आया हूँ। कभी नटखट, कभी बहादुर, कहीं सलीम, तो कहीं रूठे; न जाने कितनी सूरतों में कृष्ण को पढ़ा और सुना। बचपन में सीधे मअने से ही देखता, इसलिए सारी कहानियाँ दिलकश लगती थीं। उम्र के साथ बढ़ती सोच ने यह एहसास कराया, कि हर कहानी महज़ तफ़्रीह१ नहीं, बल्कि दुनियवी लौस-ए-दुनिया२ को समझाता एक ख़ूबसूरत किताबचा है। तशद्दुद३, तानाशाही और मन्फ़ी४ से आलूदा मौजूदा दौर में इन कहानियों के असल मअने समझना लाज़िमी है। कृष्ण ने भी तशद्दुद के तेवर अपनाए, मगर महज़ मन्फ़ी को हलाक करने की ख़ातिर। उन्होंने बेशक ज़नाँ को चिढ़ाया, मगर उस चिढ़ाने को अनचाही सूरत में तब्दील नहीं होने दिया। यही वजह थी, कि कृष्ण ने हज़ारों बेबस जनाँ की हिफ़ाज़त भी की। आज ज़नाँ तो क्या, हर मासूम, हर इन्सान ख़ौफ़ में जीने पर मजबूर है। वक़्त आ चुका है, कि हममें से हर शख़्स कृष्ण की ज़िहनियत५ के पहलुओं को ख़ुद में ढाले; वर्ना हमारा मुस्तक़्बिल यक़ीनन् मौजूदा हाल से भी तारीक६ होगा।

तुम्हें महज़ पुकार कर सँभले थे, परख़चे मज़्‌रूह इस्मत७ के,
तुम्हारे बस तसव्वुर८ से ही, धीरज रहे थे पांचाली के,
आज पशेमाँ है इन्सानियत, ग़ालिब हैं तेवर ग़ैर-मुहज़्ज़ब९ के,
ख़ौफ़नाक मौजूदा हालात, मुन्हदिम१० हवासिल११ ज़नान के.

वहशी लगा ही रहे हैं ठहाके, आबरूरेज़ी१२ सरे आम कर,
न ज़न बेख़ौफ़ रही न बचपन, न ज़र१३ महफ़ूज़ न ज़ेवर,
क़ादिर-ए-मुतलक़१४ कैसे मानें तुम्हें, ख़ामोश हो बावजूद सब जानकर,
क्या वाक़िई खो गए हो कृष्ण, या क़स्दन्१५ बैठे हो छिपकर.

■ Janmaashtami
(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)
(१-entertainment, २-worldly traps of illusion world, ३-violence, ४-negativity, ५-nature, ६-dark, ७-honour, ८-imagination, ९-uncouth, १०-shattered, ११-courage, १२-disgrace, १३-wealth, १४-most powerful, १५-purposely)
*****

04 November, 2018

• From Darkness to Light

May the world face ‘Manthana’ again,
to discover ‘Ratnas’ brilliant,
Those of love, peace and wisdom,
to be valorous, vigorous and valiant,
Justice is done promptly and truly,
sinner can no longer be defiant,
Earth is ruled by good alone,
evil no longer giant.

No one be left to be an orphan,
let each one get a lap so nurturing,
Each soul may then live and inscribe,
a beautiful verse, caring,
Feeding each belly, a sacred ritual,
the demon of hunger, an offering,
Let the world be prosperous enough,
to end poverty and suffering.

The light of knowledge may now,
light up the path to rightness,
‘Bali’ showers blessings,
farmers reap happiness,
Contented humanity yet again recites,
a gentle rhyme of kindness,
Each ‘Karma’ and sacrifice be supreme,
dictate volumes of greatness.

■ Wishing all readers a very Happy Deepavali and a Prosperous New Year.
*****

Readers may also like: (Hindi lines) https://jsrachalwar.blogspot.com/2016/10/blog-post_97.html
(Select lines from my English poetry book)

18 October, 2018

• Bless those souls, O Rama

Women crushed in wombs and in open,
humanity laid on pyre,
Mere effigies burned each year,
thoughts do still respire,
Evil sucking good and pure,
laughing out loud, an indecent satire,
Glorious once upon a time,
the nation gasps in an endless quagmire.

Masters continue to snore,
the economy stuck in a tangle,
Money continues to bully,
truth lynched by muscle,
Cruel roams around fearless,
continues to bleed the gentle,
But a handful of souls humane,
carry on fighting the battle.

Allow them to cross ‘Maryada’,
but to become ‘Purushottama’,
May each beat be gallant,
valiant be their ‘Karma’,
Each act divine,
define the real essence of ‘Dharma’,
To bring back the splendour again,
Bless those souls, O Rama.

■ Wishing all readers a very happy Vijaya-Dashmi.

(Vijaya-Dashmi is an Indian festival.)
(Select lines from my English poetry book)
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05 September, 2017

• क्षम्यताम् परमेश्वर

   रेल्वे ची भीषण दुर्घटना आणि तथाकथित बाबाच्या अटकेविरोधात उसळलेल्या डोंबाने झालेले श्रींचे स्वागत हृदयावर आघात करून गेले. खरे पाहता अशा अप्रिय घटना सांप्रत नियमितताच झाली आहे. म्हणूनच की काय त्यांच्याकडे बघण्याचा आपला दृष्टिकोन देखील जरा बोथटच झाला आहे. इतर वेळी अल्प काळ अस्वस्थ करणाऱ्या अशा घडामोडी मंगल प्रसंगी मात्र चटका लावून जातात. आगमनाच्या दिवशीच गालबोट लागल्याचे पाहून मन खजील झाले आणि मुखातून नकळत 'क्षम्यतां परमेश्वर' निघाले.
    रेल्वे असो अथवा आस्था, बारकाईने बघता भारतात प्रत्येक क्षेत्र बिकट पेचात असल्याचेच जाणवते. कुठल्या आघाडीवर पहिली मोहीम आखावी हेच कळेनासे झाले आहे. वर्षानुवर्ष राबवलेल्या हलगरजी व गाफील धोरणांमुळे भ्रष्टाचार एखाद्या चिवट वृक्षाप्रमाणे आपली पाळेमुळे घट्ट रोवून बसलाय. मुळांच्या शिरकावाने पोखरलेल्या भिंतींना भगदाडे पडणारच आणि घरात पलीकडील उपद्रव शिरणारच. त्या उपद्रवाशी दोन हात करताना कामी आलेल्यांचे तपशील अंगावर शहारे आणतात. जेवढे संतत हौतात्म्य, तेवढेच सातत्य त्यांच्याबद्दलच्या अनास्थेतही पाहून मन विषण्ण होते. दुरून साजर्‍या दिसणार्‍या पारंब्यांच्या विळख्यात देश कासावीस होतोय. राजकारण, अर्थकारण आणि धर्मकारण यांच्या घट्ट वीणेच्या पाशात राष्ट्राचा श्वास गेली कित्येक वर्ष गुदमरतोय. प्रत्येक क्षेत्रात खोलवर रुजलेली अनागोंदी व अंदाधुंदी पाहून संताप येतो; पण तोंड दबलेलेच राहू देऊन बुक्क्यांचा मार सहन करण्यापलीकडे काहीच करता येत नाही. अभिव्यक्ती-स्वातंत्र्याचे धिंडवडे निघालेल्या राष्ट्राचे भवितव्य सुज्ञास सांगणे न लगे.
    पण ह्या सगळ्या औदासीन्यात श्रींचे आगमन नेहमी ‘सुखदायक भक्तांंसी’ असेच असते. मूर्तीची निवड ते आरास, रांगोळी, मखर, सजावट, नैवेद्य इत्यादी गोष्टींच्या गराड्यात काही काळ का होईना, दुःख जरा विरळ होते; क्वचित विसरही पडतो. आचमनाचे गोविंदाय नमः म्हणताच निराळा हुरूप येतो. रक्ष रक्ष परमेश्वर म्हणत विघ्नहर्त्याला साकडे घालताना आचरणात आजही आगळीच निरागसता येते. लंबोदराचे लोभस रूप पाहून किती साठवू लोचनी म्हणत मी दर वर्षी अतृप्तच राहतो. कर जोडून मुखाने पुण्योऽहम् तव दर्शनात् म्हणेपर्यंत आज देखील ब्रह्मानंदी टाळी लागते; आणि विसर्जनाचे मोरया म्हणताना अजूनही दाटूनच येते.
    दर वर्षी ढोल-ताशांच्या कर्णमधुर कल्लोळात गणराय वाजतगाजत येतात आणि दहा दिवस अनंत उत्साह भरून निरोपाच्या घडीला नयनी पूरही आणतात. त्यांनी मुक्तहस्ते वाटलेल्या सद्बुद्धीस काही भद्रजन सश्रद्ध ग्रहण करतात; म्हणूनच सध्या सुरु असलेल्या अखंड रणधुमाळीतही देश समाधानाचे चार श्वास घेऊ शकतो. सातत्याने होत असलेल्या प्रचारामुळे कर्मठ लोकांनी देखील प्रदूषण कमी करण्याच्या हेतुने विसर्जनाच्या सुधारित पद्धती अवलंबिणे ही गजाननाने दिलेल्या सद्बुद्धीची झलकच म्हणावी लागेल. पर्यावरण स्वच्छ राखण्याच्या दृष्टीने होत असलेल्या प्रयत्नांना मन आणि बुद्धी निर्मळ करण्याच्या इच्छाशक्तीचीही साथ लाभली, तर गणनायकाच्या प्रसादाचा गोडवा काही औरच असेल.

आवळ तव पाश आता, करिण्या काळ पातकाचा,
लागो अंकुश अधमावर, तीक्ष्ण तुझ्या बुद्धीचा,
व्हावा मोदकापरी मधुर, शब्द तो सकळ जनांचा,
होवो भद्र गणांचे, नायक असे तू ज्यांचा।

कंठ दाटला स्मृतींनी, ठोका चुकला काळजाचा,
जातो हुरहुर लावुनी, सहवास औट घटकांचा,
किती रे लपवावा आम्ही, ओलावा त्या कडांचा,
लवकर परत रे बाप्पा, धीर सुटत असे आमुचा।

■ गणेशोत्सव
(Select lines from my Marathi poetry book)
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28 April, 2017

'अक्षय्य तृतीया'

अक्षय्य हो बल, धैर्य, शौर्य, हो क्षय हर पातकी,
हर वार हो परशु सा, हर गाथा दिग्विजय की,
हो पूजन वैभव का, भक्ति भी अप्रतिम की,
हो प्रारंभ महाकथा भी, किंतु शांति के महापर्व की।
*****