जिन्होंने हमारी ज़िंदगी
का हर साज़ बुना,
जिन ग़ालिब जड़ों पर
हमें नाज़-ओ-फ़ख़्र है,
जिनसे है हमारे
वुजूद का हर ताना-बाना,
उन्हीं की वसीक़त
आज बंद बन चुकी है.
रुसवाइयों के चंद
लमहात से ख़ुद को जुदा कर सकें,
पशेमानी से मज़्रूह,
तख़्लिया में अश्क बहा सकें,
रंजिश के शोलों से
रिहा हो, आब-ए-मुहब्बत नहा सकें,
मुम्किन नहीं हम
दरख़्तों को, कि हिज़्रत कर सकें.
क़त्रा क़त्रा जमा
की हुई मुहब्बत की बूँदों ने,
नफ़्रत ने नवाज़े
हुए फफोलों को सँवार लिया,
परायों की झूठी तसल्ली
के मरहम ने,
अपनों ने दिए हुए ज़ख़्मों
को सहलाया.
हल की तलाश में
सवालात के बवंडर,
बदलती हवा के साथ भेजे
कई मुक़ामात पर,
कभी पाई शमीम, जो
आई थी जवाबों को लिपटकर,
कभी लौट आए सवालात,
कई और सवालात लेकर.
चंद ज़र-ए-गुल भी
गए थे उस बदलती हवा के साथ,
वह भी मुल्क शादाब
हुआ उनके करम से,
उन्हीं गुलों का आब-ए-हयात
आया घटाओं के साथ,
मुतमइन हुआ ज़र्रा ज़र्रा
वतन, उनकी बरसाई नशात से.
यह मीठे-कड़वे तज्रुबे
ग़ैरमुतवक़्क़िअ तो नहीं,
यह तमाम मसाइल भी
ग़ैरइख़्तियारी हैं,
इन पेचीदा हालात
से रिहाई भी मुम्किन नहीं,
इन्हीं से शायद सिर्र-क़ैद-ए-हयात
के फ़साने हैं.
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