The
leaves, the twigs, the trees,
(Select lines from my English poetry book)
A collection of promotional pages of my poetry books, poems, stories and articles
The
leaves, the twigs, the trees,
(Select lines from my English poetry book)
भारत की ज़ियादातर रियासतों१
का साल का लंबा दौर गर्मी में बीतता है, लिहाज़ा यहाँ सर्मा२ का इस्तिक़बाल३
गर्मजोशी से होता है। सब को आसूदा४ करने वाले इस मौसम के आते ही ठंडी हवाओं
में नहाकर सुबह कोहरे में लिपट जाती है। ताज़ी सब्ज़ियों से मंडियाँ सँवर जाती हैं, और
मुख़़्तलिफ़५ फलों की ख़ुशबू से फ़ज़ा महक उठती है। लहलहाती फ़लाहतों६
में इज़्तिमाअ७ कर तरह-तरह के लज़ीज़८ गिज़ाओं९ का लुत्फ़१०
उठाने का भी रिवाज है।
एक ओर सब को तर-ओ-ताज़ा करने वाला यह मौसम कई मग्रिबी-ओ-शुमाली११
मुल्कों में क़हर भी ढाता है। तूफ़ानी बर्फ़बारी और इंतिहाई१२ ठंड के नतीजतन्
इन मुल्कों में लोग बेहद मुश्किल हालात से जूझते हैं। सर्मा हो या गर्मा१३,
हर मौसम का एक पहलू लुभावना, तो दूसरा शदीद होता है।
उन दिनों मैं
नियमित युद्धाभ्यास के लिए हमारे दल के साथ राजस्थान में था। सूरज ढलते ही
रेगिस्तान में ठंडक अपना जादू बिखेरना आरंभ करती थी। जो दिन में अत्यधिक तापमान से
भयावह लगती, वही महीन रेत रात को माँ की गोद का सुकून दिलाती थी; और इन सब में
मिसरी घोलने चाँद भी आ जाता था। कभी अर्धरूप, तो कभी पूर्ण में। मीलों दूर फैली
रेत पर बिखरी दूधिया कौमुदी, टिमटिमाते तारे, और पूर्णिमा का चंद्रमा; मुझे
सम्मोहित करने के लिए इतना पर्याप्त था। मैं न जाने कितनी देर तक सृष्टि की उस
अनुपम कलाकृति को देखता; किंतु कभी संतुष्टि हुई ही नहीं।
‘चंद्रमा’ सृष्टि से जुड़ी मेरी रचनाओं की श्रुंखला की एक कड़ी है; बाक़ी कड़ियों
की तरह ही अपूर्ण।
सब कहते हैं दाग़ हैं
मुझमें, माँ नज़र उतारते न थकी,
■ शरद पूर्णिमा