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02 April, 2022

• नूतन वर्षाभिनंदन

    महाराष्ट्र में ‘गुढी पाडवा’, दक्षिण भारत में ‘उगादी’ या ‘युगादी’, और अन्य कई राज्यों में विविध नामों से पहचाने जानेवाले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन कुछ देशों में ‘लाठी उत्सव’ भी मनाया जाता है। लाठी, गुढी, पताकाएँ, पुष्पमालाएँ, तोरण इत्यादि माध्यमोंद्वारा विजय की घोषणा अथवा विजयी समूह का स्वागत करना संभवता इन प्रथाओं का हेतु रहा होगा। नीम के फूल व कोमल पत्ते, गुड़, हिंग, इमली, कैरी, धनियादाना, अजवायन, काली मिर्च, नमक इत्यादि वस्तुओं से बना नैवेद्य अर्पण करने की परंपरा कई समुदायों में प्रचलित है। विविध हितकर वनस्पति-रसों का संतुलित व नियमित सेवन निरामयता के लिए आवश्यक होने का संदेश देना इन परंपराओं का उद्देश्य होगा। साढ़े-तीन मुहूर्तों में से एक होने के कारण कई नए कार्यों व प्रकल्पों का इस मंगल अवसर पर शुभारंभ होता है। सृष्टि का रूप शीघ्र परिवर्तित होने लगता है। पतझड़ अपने अंतिम पड़ाव पर होता है, और कोमल पल्लव नूतनागमन की आहट लाता है। अनाज से लहलहाते खलिहान और पेड़-पौधों पर खिला बौर रंगबिरंगे पंछियों के लिए ख़ज़ाना साबित होता है। विविध पक्षियों के मंजुल कल-रव से केवल भोर ही नहीं, बल्कि पूर्ण दिवस ही कर्णमधुर हो जाता है। पश्चिमी देशों में यह काल त्योहार के रूप में चाहे न मनाया जाता हो, लेकिन वसंत ऋतु का मनोरम उपहार लेकर उपस्थित होता है, और आनंद की बौछार करता है।

     चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्रह्माद्वारा सृष्टि की रचना हुई ऐसी मान्यता है। कई लोग इस दिन आदिशक्ति का पूजन करते हैं। रावणवध पश्चात राम का अयोध्या में आगमन और शालिवाहन ने शकोंपर पाया विजय भी इन्हीं दिनों की घटनाएँ मानी जाती हैं। विभिन्न पौराणिक कथाएँ व जीवनशैलियों की समीक्षा करने पर प्रतीत होता है, कि विजय का प्रतीक माना हुआ यह दिवस सुख, समृद्धि तथा ख़ुशहाली का संदेश देकर जनमानस को आनंद से सराबोर कर देता है।

आयो बसंत परिमल, श्वास करे हर चेतन,

पलाश करता चंचल, रचा सराबोर सपन,
दानों से हर्षित हर कण, मिट्टी का महके तन-मन,
चैतन्यता वह चैत की, चपल करे हर जीवन।

वर्धन हो ब्रह्मा के अप्रतिम का, सम्मान भी,
हो पराकाष्ठा पुरुषोत्तम सी, मर्यादा भी,
हो समृद्ध विश्व, मानस निरामय भी,
कर्म हो शालिवाहन से, बढ़े साम्राज्य, शांति भी।

■ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
*****
# Hindu New Year, Gudhi Padwa

25 December, 2021

• May the World be Merry

     Violence has been a curse to mankind for ages. In the past, incidents could not reach everyone due to the unavailability of the media. The manner they were recorded might have been as subjective and biased as they are at present. Even today, we remain uninformed, moreover misinformed about many past and present facts. Segments with vested interests have always intentionally, promptly and skilfully misused the rapidly changing contemporary media. They expertly portrayed a noble person as an offender; and vice versa too, with similar proficiency. The architects who gave us the gift of the golden present-day were maliciously portrayed as villains for the damages during the course, which were both unavoidable and unintended. Distortion of facts is knowingly and purposely done to distract, offend or incite a section or a nation, leading to a conflict which usually culminates into a devastating encounter. Encounters vary in presentation and so do the wounds. The wounds may heal but the scars remain and keep reminding the following generations about the ferocity and the skirmishes of the past. Faith, belief and religion are now more potential and dangerous weapons than conventional armaments. Dirty, disgusting and murky politics have taken a sizeable toll on mankind. Filthy interests have bled humanity beyond limits. This needs to stop urgently and forever.

     Let creative thoughts take a fearless flight and kindness reach new skylines. Let us be human and humane. We cannot survive on hatred. We need to breathe compassion to stay alive. The world desperately needs sympathy to persist. Let love be supreme.


The dawn of truth will illuminate,
the horizon and the thoughts,
Each sunrise shall wipe off,
the gloom and the evil blots,
A rainbow imparting harmony,
will strengthen the humane knots,
Supreme rays kindle our strength,
to fight the darkness and the jolts.

Lines of control harsh,
may no longer rule our emotions,
Humble and sweet verses,
console the wounded nations,
Let humanity be free,
from the chains of beliefs and religion,
Pen and art be sovereign,
to dictate love and compassion.

Christmas & New Year
(Select lines from my English poetry book)
*****

30 October, 2020

• The Moon

You see just half of me,
the remaining one is always on an excursion,
To a world unlike yours,
with similar ardour and affection,
The ecstasy of union is the same,
similar is the agony of separation,
Worlds differ just materially,
identical are romance and passion.

■ Sharad Poornima
(‘Sharad Poornima’ is full moon day of ‘Aashwin’ month of Hindu calendar and has a cultural significance in India.)
(Select lines from my English poetry book)
*****

• चंद्रमा

     उन दिनों मैं नियमित युद्धाभ्यास के लिए हमारे दल के साथ राजस्थान में था। सूरज ढलते ही रेगिस्तान में ठंडक अपना जादू बिखेरना आरंभ करती थी। जो दिन में अत्यधिक तापमान से भयावह लगती, वही महीन रेत रात को माँ की गोद का सुकून दिलाती थी; और इन सब में मिसरी घोलने चाँद भी आ जाता था। कभी अर्धरूप, तो कभी पूर्ण में। मीलों दूर फैली रेत पर बिखरी दूधिया कौमुदी, टिमटिमाते तारे, और पूर्णिमा का चंद्रमा; मुझे सम्मोहित करने के लिए इतना पर्याप्त था। मैं न जाने कितनी देर तक सृष्टि की उस अनुपम कलाकृति को देखता; किंतु कभी संतुष्टि हुई ही नहीं।

     ‘चंद्रमा’ सृष्टि से जुड़ी मेरी रचनाओं की श्रुंखला की एक कड़ी है; बाक़ी कड़ियों की तरह ही अपूर्ण।

सब कहते हैं दाग़ हैं मुझमें, माँ नज़र उतारते न थकी,

जानती थी तुम यूँ ही ताकोगे, कस्र न उसने छोड़ी बाक़ी,
बस उसीसे डटा हुआ हूँ, हृदय पर निशाँ हर छोडूँ मैं बाक़ी,
देख मेरी लीला हो विचलित, छलकाता पात्र को साक़ी।

 शरद पूर्णिमा

(Select lines from my Hindi poetry book)
*****

09 March, 2020

• फागुन

भस्म हों रिपु समस्त, मानस मुक्त हो भय से,
होलिकानल पावन हो, आहुति हर श्रेष्ठ से,
धधके हर स्पंदन अब, तिमिर नष्ट हो हृदय से,
प्रकाशमान होती हर दिशा, फागुन की ज्वाला से।

रंग चढ़ें, घुलें भी, सजे हर कण सृष्टि का,
मिले स्नेह, बढ़े भी, अंत हो कलह, द्वेष का,
कोकिल सी वाणी मधुर, बने साज़ हर श्वास का,
हृदय हर परिधान करे, गुलाल उत्कट पलाश का।

फागुन पूर्णिमा और धुलेंडी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
*****

15 January, 2020

• Makar-Sankranti


May the harvest be enough,
To feed the abandoned hunger,
Sweetness will fill the heart,
To eliminate and conquer anger,
The sunshine of knowledge,
Building our thoughts brighter,
Each life, now a colourful canvas,
With bonds of humanity stronger.

Pray this spring the breeze,
Carry the fragrance of kindness,
To the land of sorrow and grief,
Battered by violence by the ruthless,
The chirping, gentle shall recite,
A verse of fortune and fondness,
May we prosper as humane,
And reach the horizons of happiness.

Greetings
*****
Related links:

(Select lines from my English poetry book)

29 September, 2019

• नवरात्रि

     भारत में नवरात्रि का त्योहार मनाने के तराइक़ मुख़्तलिफ़ हैं; लेकिन इसका नाक़ाबिल-ए-तक़्सीम हिस्सा होता है एक मुख़्तसर मगर अज़ीम दीया। नौ दिनों तक शब-ओ-रोज़ जलते दीये की सलीम लौ से फैलती रोशनी में फ़ज़ा आसूदा होती है। आरज़ू है, कि यह रोशनी हर शख़्स की ज़िंदगी अमन-ओ-सुकून से मुनव्वर करे।

हर लौ का पर्तोव बने, इस्तिलाह ग़ालिब हौसले की,

रोशन हों तारीक राहें, मन्फ़ी१० मिटे हर ज़िहन की,
फ़रोज़ाँ११ हो आलम इल्म१२ से, रहनुमाई में इल्मदाँ१३ की,
क़लम-ए-अदम-ए-तशद्दुद१४ लिखे, तहरीर मुस्तक़्बिल१५ की.

■ Navaraatri Greetings
(Select lines from my Hindi poetry book)
(Navaraatri is an Indian festival)

(१-various, २-inseparable, ३-day & night, ४-calm, ५-contented, ६-illuminate, ७-glow, ८-definition, ९-dark, १०-negativity, ११-illuminate, १२-knowledge, १३-scholar, १४-pen of non-violence, १५-future) 
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30 August, 2019

• मुट्ठी भर अनाज

     एक लंबे अरसे से किसानों की आत्महत्याओं ने देश के समक्ष बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न निर्माण कर दिया है। भ्रष्टाचार के अनेक पहलुओं में से ‘जागृति’ में तो केवल एक का वर्णन था। किसानों की समस्या भी भ्रष्टाचार का ही एक अहम्‌ पहलू है। सहस्रों करोड़ों की योजनाओं के घोटाले से विपुल इस देश में, कुकर्मियों ने अन्न की उपज तक को नहीं बख़्शा। विशेषज्ञों की राय में भविष्य का संघर्ष अन्न व जल के लिए ही होगा। हमारे देश की कृषि और किसानों की दयनीय स्थिति देखकर तो यह राय सत्य प्रतीत होती है। जो भी इस दुष्कृत्य में शामिल हैं वे शायद यह नहीं जानते, कि अन्न व जल के बिना न तो सत्ता और न ही ऐश्वर्य का कोई अस्तित्व है।

     हमारे देश की लगभग प्रत्येक समस्या की जड़ भ्रष्टाचार या हमारी संवेदनशून्य और बधिर प्रवृत्ति है। अत्यंत भीषण गरीबी में जीवन व्यतीत करते किसानों को खिलखिलाते खलिहानों में मुसकाते देखने हेतु न जाने और कितनी प्रतीक्षा करनी होगी।

कुछ तो हो तकनीक सुदृढ़, उपज भूमि की बढ़ाए,
योजना कुछ हो सफल अब, गंगा हर अब द्वार आए,
कुपित सृष्टि हो तो कोई, मदद के कुछ कर बढ़ाए,
बलि की संतानें ज़िंदा, रहें ऐसा प्रण बनाएँ।

Pola (A bull-worshipping festival)

(Select lines from my Hindi poetry book)

(Primarily a farmer’s festival of Maharashtra, ‘Pola’ is celebrated in some areas of Chattisgarh and Telagana too. Being the backbone of Indian farming since ages and even today, bulls are worshipped every year on this auspicious new moon day of ‘Shraavan’ month of the Hindu calendar.)
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23 August, 2019

• कहाँ हो तुम कृष्ण

    ‘कृष्ण’ से जुड़ी कहानियाँ तो बचपन से सुनता आया हूँ। कभी नटखट, कभी बहादुर, कहीं सलीम, तो कहीं रूठे; न जाने कितनी सूरतों में कृष्ण को पढ़ा और सुना। बचपन में सीधे मअने से ही देखता, इसलिए सारी कहानियाँ दिलकश लगती थीं। उम्र के साथ बढ़ती सोच ने यह एहसास कराया, कि हर कहानी महज़ तफ़्रीह नहीं, बल्कि दुनियवी लौस-ए-दुनिया को समझाता एक ख़ूबसूरत किताबचा है। तशद्दुद, तानाशाही और मन्फ़ी से आलूदा मौजूदा दौर में इन कहानियों के असल मअने समझना लाज़िमी है। कृष्ण ने भी तशद्दुद के तेवर अपनाए, मगर महज़ मन्फ़ी को हलाक करने की ख़ातिर। उन्होंने बेशक ज़नाँ को चिढ़ाया, मगर उस चिढ़ाने को अनचाही सूरत में तब्दील नहीं होने दिया। यही वजह थी, कि कृष्ण ने हज़ारों बेबस जनाँ की हिफ़ाज़त भी की। आज ज़नाँ तो क्या, हर मासूम, हर इन्सान ख़ौफ़ में जीने पर मजबूर है। वक़्त आ चुका है, कि हममें से हर शख़्स कृष्ण की ज़िहनियत के पहलुओं को ख़ुद में ढाले; वर्ना हमारा मुस्तक़्बिल यक़ीनन् मौजूदा हाल से भी तारीक होगा।

तुम्हें महज़ पुकार कर सँभले थे, परख़चे मज़्‌रूह इस्मत के,
तुम्हारे बस तसव्वुर से ही, धीरज रहे थे पांचाली के,
आज पशेमाँ है इन्सानियत, ग़ालिब हैं तेवर ग़ैर-मुहज़्ज़ब के,
ख़ौफ़नाक मौजूदा हालात, मुन्हदिम१० हवासिल११ ज़नान के.

वहशी लगा ही रहे हैं ठहाके, आबरूरेज़ी१२ सरे आम कर,
न ज़न बेख़ौफ़ रही न बचपन, न ज़र१३ महफ़ूज़ न ज़ेवर,
क़ादिर-ए-मुतलक़१४ कैसे मानें तुम्हें, ख़ामोश हो बावजूद सब जानकर,
क्या वाक़िई खो गए हो कृष्ण, या क़स्दन्१५ बैठे हो छिपकर.

■ Janmaashtami
(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)
(१-entertainment, २-worldly traps of illusion world, ३-violence, ४-negativity, ५-nature, ६-dark, ७-honour, ८-imagination, ९-uncouth, १०-shattered, ११-courage, १२-disgrace, १३-wealth, १४-most powerful, १५-purposely)
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15 January, 2019

• मकर-संक्रांति

फ़स्ल की सरगोशी सुनाती, तराना काश्तकारी का,
गुनगुन पंछियों की देती, क़ियास मौसम-ए-बहार का,
आब-ए-रूद खिलखिला कहता, नग़्मा सुकून-ए-आबाद का,
शीरीनी पा गुड़ सी, तिल-तिल बढ़े अमन का.

(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)


(१-whispering, २-farming, ३-speculation, ४-river water, ५-satisfying prosperity, ६-sweetness, ७-peace)
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Related links:
# Sankranti

04 November, 2018

• From Darkness to Light

May the world face ‘Manthana’ again,
to discover ‘Ratnas’ brilliant,
Those of love, peace and wisdom,
to be valorous, vigorous and valiant,
Justice is done promptly and truly,
sinner can no longer be defiant,
Earth is ruled by good alone,
evil no longer giant.

No one be left to be an orphan,
let each one get a lap so nurturing,
Each soul may then live and inscribe,
a beautiful verse, caring,
Feeding each belly, a sacred ritual,
the demon of hunger, an offering,
Let the world be prosperous enough,
to end poverty and suffering.

The light of knowledge may now,
light up the path to rightness,
‘Bali’ showers blessings,
farmers reap happiness,
Contented humanity yet again recites,
a gentle rhyme of kindness,
Each ‘Karma’ and sacrifice be supreme,
dictate volumes of greatness.

Wishing all readers a very Happy Deepavali and a Prosperous New Year.
*****

Readers may also like: (Hindi lines) https://jsrachalwar.blogspot.com/2016/10/blog-post_97.html
(Select lines from my English poetry book)

18 October, 2018

• Bless those souls, O Rama

Women crushed in wombs and in open,
humanity laid on pyre,
Mere effigies burned each year,
thoughts do still respire,
Evil sucking good and pure,
laughing out loud, an indecent satire,
Glorious once upon a time,
the nation gasps in an endless quagmire.

Masters continue to snore,
the economy stuck in a tangle,
Money continues to bully,
truth lynched by muscle,
Cruel roams around fearless,
continues to bleed the gentle,
But a handful of souls humane,
carry on fighting the battle.

Allow them to cross ‘Maryada’,
but to become ‘Purushottama’,
May each beat be gallant,
valiant be their ‘Karma’,
Each act divine,
define the real essence of ‘Dharma’,
To bring back the splendour again,
Bless those souls, O Rama.

Wishing all readers a very happy Vijaya-Dashmi.

(Vijaya-Dashmi is an Indian festival.)
(Select lines from my English poetry book)
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02 March, 2018

‘सदा-ए-फागुन’

सतरंग चढ़ते-घुलते रंगाते, मुलव्वन हर क़त्रा क़ुद्रत का,

प्यार मिलता-बढ़ता हटाता, साया नफ़्रत-ओ-रंजिश का,
कोयल सी शीरीं ज़बाँ बनती, साज़ हर तरन्नुम-ए-धड़कन का,
ओढ़ती हर साँस देखो, कैफ़-ओ-गुलाल गुल-ए-पलास का.

Holi Greetings
(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)

(सदा-ए-फागुन-call of Phagun, १-colorful, २-hatred & enmity, ३-sweet, ४-song of heartbeats, ५-elation& Gulal)
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05 September, 2017

• क्षम्यताम् परमेश्वर

   रेल्वे ची भीषण दुर्घटना आणि तथाकथित बाबाच्या अटकेविरोधात उसळलेल्या डोंबाने झालेले श्रींचे स्वागत हृदयावर आघात करून गेले. खरे पाहता अशा अप्रिय घटना सांप्रत नियमितताच झाली आहे. म्हणूनच की काय त्यांच्याकडे बघण्याचा आपला दृष्टिकोन देखील जरा बोथटच झाला आहे. इतर वेळी अल्प काळ अस्वस्थ करणाऱ्या अशा घडामोडी मंगल प्रसंगी मात्र चटका लावून जातात. आगमनाच्या दिवशीच गालबोट लागल्याचे पाहून मन खजील झाले आणि मुखातून नकळत 'क्षम्यतां परमेश्वर' निघाले.
    रेल्वे असो अथवा आस्था, बारकाईने बघता भारतात प्रत्येक क्षेत्र बिकट पेचात असल्याचेच जाणवते. कुठल्या आघाडीवर पहिली मोहीम आखावी हेच कळेनासे झाले आहे. वर्षानुवर्ष राबवलेल्या हलगरजी व गाफील धोरणांमुळे भ्रष्टाचार एखाद्या चिवट वृक्षाप्रमाणे आपली पाळेमुळे घट्ट रोवून बसलाय. मुळांच्या शिरकावाने पोखरलेल्या भिंतींना भगदाडे पडणारच आणि घरात पलीकडील उपद्रव शिरणारच. त्या उपद्रवाशी दोन हात करताना कामी आलेल्यांचे तपशील अंगावर शहारे आणतात. जेवढे संतत हौतात्म्य, तेवढेच सातत्य त्यांच्याबद्दलच्या अनास्थेतही पाहून मन विषण्ण होते. दुरून साजर्‍या दिसणार्‍या पारंब्यांच्या विळख्यात देश कासावीस होतोय. राजकारण, अर्थकारण आणि धर्मकारण यांच्या घट्ट वीणेच्या पाशात राष्ट्राचा श्वास गेली कित्येक वर्ष गुदमरतोय. प्रत्येक क्षेत्रात खोलवर रुजलेली अनागोंदी व अंदाधुंदी पाहून संताप येतो; पण तोंड दबलेलेच राहू देऊन बुक्क्यांचा मार सहन करण्यापलीकडे काहीच करता येत नाही. अभिव्यक्ती-स्वातंत्र्याचे धिंडवडे निघालेल्या राष्ट्राचे भवितव्य सुज्ञास सांगणे न लगे.
    पण ह्या सगळ्या औदासीन्यात श्रींचे आगमन नेहमी ‘सुखदायक भक्तांंसी’ असेच असते. मूर्तीची निवड ते आरास, रांगोळी, मखर, सजावट, नैवेद्य इत्यादी गोष्टींच्या गराड्यात काही काळ का होईना, दुःख जरा विरळ होते; क्वचित विसरही पडतो. आचमनाचे गोविंदाय नमः म्हणताच निराळा हुरूप येतो. रक्ष रक्ष परमेश्वर म्हणत विघ्नहर्त्याला साकडे घालताना आचरणात आजही आगळीच निरागसता येते. लंबोदराचे लोभस रूप पाहून किती साठवू लोचनी म्हणत मी दर वर्षी अतृप्तच राहतो. कर जोडून मुखाने पुण्योऽहम् तव दर्शनात् म्हणेपर्यंत आज देखील ब्रह्मानंदी टाळी लागते; आणि विसर्जनाचे मोरया म्हणताना अजूनही दाटूनच येते.
    दर वर्षी ढोल-ताशांच्या कर्णमधुर कल्लोळात गणराय वाजतगाजत येतात आणि दहा दिवस अनंत उत्साह भरून निरोपाच्या घडीला नयनी पूरही आणतात. त्यांनी मुक्तहस्ते वाटलेल्या सद्बुद्धीस काही भद्रजन सश्रद्ध ग्रहण करतात; म्हणूनच सध्या सुरु असलेल्या अखंड रणधुमाळीतही देश समाधानाचे चार श्वास घेऊ शकतो. सातत्याने होत असलेल्या प्रचारामुळे कर्मठ लोकांनी देखील प्रदूषण कमी करण्याच्या हेतुने विसर्जनाच्या सुधारित पद्धती अवलंबिणे ही गजाननाने दिलेल्या सद्बुद्धीची झलकच म्हणावी लागेल. पर्यावरण स्वच्छ राखण्याच्या दृष्टीने होत असलेल्या प्रयत्नांना मन आणि बुद्धी निर्मळ करण्याच्या इच्छाशक्तीचीही साथ लाभली, तर गणनायकाच्या प्रसादाचा गोडवा काही औरच असेल.

आवळ तव पाश आता, करिण्या काळ पातकाचा,
लागो अंकुश अधमावर, तीक्ष्ण तुझ्या बुद्धीचा,
व्हावा मोदकापरी मधुर, शब्द तो सकळ जनांचा,
होवो भद्र गणांचे, नायक असे तू ज्यांचा।

कंठ दाटला स्मृतींनी, ठोका चुकला काळजाचा,
जातो हुरहुर लावुनी, सहवास औट घटकांचा,
किती रे लपवावा आम्ही, ओलावा त्या कडांचा,
लवकर परत रे बाप्पा, धीर सुटत असे आमुचा।

■ गणेशोत्सव
(Select lines from my Marathi poetry book)
*****

10 May, 2017

‘बुद्ध’

भेद रंगों पंथों में न हो, सम्मान हो पावन कर्मों का,
गाए गीत हर श्वास अब, शील, मैत्री, करुणा का,
मिटे बोध से तुम्हारे, तिमिर अज्ञानी मन का,
पुनः स्मित करो बुद्ध, घोष हो शांति के पर्व का।

 बुद्ध पूर्णिमा

           कामना है, कि द्वेष के मँडराते बादल शीघ्र हटें, और समस्त पृथ्वी सद्भावना की कौमुदी प्राशन कर तृप्त हो।
*****
# Buddha, War, Love, Peace

28 April, 2017

'अक्षय्य तृतीया'

अक्षय्य हो बल, धैर्य, शौर्य, हो क्षय हर पातकी,
हर वार हो परशु सा, हर गाथा दिग्विजय की,
हो पूजन वैभव का, भक्ति भी अप्रतिम की,
हो प्रारंभ महाकथा भी, किंतु शांति के महापर्व की।
*****

14 January, 2017

• मकर-संक्रांति

नभ सजे मंगल शुभ रंगों से, देश, विदेशों के भी,
सहस्ररश्मि के आशीष, दिव्य हो संक्रमण, पावन भी,
उद्धार हो पतित का अब, पातक का उच्चाटन भी,
तिल-तिल बढ़े मधुरता, स्नेह, शांति, मानवता भी।

26 October, 2016

'दीपावली'

अब न हो अन्याय की जय, न्याय का ही छत्र हो,
लहू-पिपासु पापियों का, रात्रि हर अब काल हो,
रात अँधियारी वह जाकर, उषा-काल अब रम्य हो,
आशा की किरणें नहाए, सुनहरा आकाश हो।

(Select lines from my Hindi poetry book)
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