न न्याय की याचना,
अब न करेंगे संवाद,
किया है शरसंधान भेदने
सिंहासन कलंकित,
प्रेरित होगी प्रजा
सुन हुंकार का अनुनाद,
करने चूर चूर प्रत्येक
अहंकारी और अनुचित।
अन्याय को भस्म
करे आक्रोश की ज्वाला प्रचंड,
चहूँओर फैले
दावानल, धधकती रहे उत्तेजना,
प्रदीप्त रखे
आत्मबल को दहकता क्रांतिसूर्य उद्दंड,
उज्ज्वल करे आकाश
नए स्वातंत्र्य की स्थापना।
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# Revolution, Independence, Democracy
