10 June, 2026

• दृष्टि


     सनातन जीवनपद्धति में श्राद्ध विधि का विशेष महत्त्व है। चावल के पिंड को जब तक कौआ चोंच से स्पर्श नहीं करता, तब तक मृत व्यक्ति की उसके जीवित क्षण में कोई इच्छा अपूर्ण रही होगी ऐसा माना जाता है। श्राद्ध के दौरान चढ़ाया भोग पितरों तक पहुँचता है ऐसी भी धारणा है। मृतक के परिजनों को यह कहकर सांत्वना दी जाती है, कि मृत व्यक्ति उनके आसपास ही अदृश्य रूप में वास करते हैं; और उनकी स्मृति की ऊर्जा से हौसला देते हैं। बचपन में सोचता था, कि क्या वाक़िई ऐसा होता होगा? विज्ञान के अद्भुत आविष्कारों ने यह भी संभव किया है। अब हमारे प्रियजन मृत्यु के पश्चात भी हमारे आसपास बदले हुए रूप में ही, किंतु जीवित रह सकते हैं। आज आधुनिक, अनूठी और हैरत-अंगेज़ तकनीकों से इन्सानी कार्निया, गुर्दे, फेफड़े, यकृत तथा स्वादुपिंड का सफल प्रत्यारोपण सहज संभव है। भारत में आज अंगदान की प्रवृत्ति प्राथमिक अवस्था में है। समाज के कुछ ही स्तर तक इसके प्रति जागरुकता है।
     मेरे पिता ने कई वर्ष पूर्व मेरे युवावस्था में पदार्पण करते ही नेत्रदान के संकल्प पत्र पर उनके साथ मुझसे भी हस्ताक्षर करवाए थे। उसी प्रेरणा से चंद वर्षों पूर्व मैंने अंगदान का भी संकल्प किया। जिन बेहतरीन कार्यों को मैं मेरे जीवित क्षणों में न कर पाऊँ; हो सकता है और मंशा भी यही है, कि मेरे पश्चात मेरे अंग पाकर कोई अन्य व्यक्ति कर दे। आशा है, कि अंगदान एक संस्कृति बन हमें अपना जीवन सार्थक करने की प्रेरणा दे।

नेत्र मेरे जियें उनसे, विश्व दर्शन प्रण हो जिनका,
भद्र पावन मनोरम ही, मंशा है अनुभव हो उनका,
करें रोशन राहें उनकी, तमोमय जीवन है जिनका,
हर दिशा मंगल हो ऐसा, प्रकाश हो अब उनके मन का।

■ World Eye Donation Day
(Select lines from my Hindi poetry book)
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05 June, 2026

• दरख़्त


जिन्होंने हमारी ज़िंदगी का हर साज़ बुना,
जिन ग़ालिब जड़ों पर हमें नाज़-ओ-फ़ख़्र है,
जिनसे है हमारे वुजूद का हर ताना-बाना,
उन्हीं की वसीक़त आज बंद बन चुकी है.

रुसवाइयों के चंद लमहात से ख़ुद को जुदा कर सकें,
पशेमानी से मज़्रूह, तख़्लिया में अश्क बहा सकें,
रंजिश के शोलों से रिहा हो, आब-ए-मुहब्बत नहा सकें,
मुम्किन नहीं हम दरख़्तों को, कि हिज़्रत कर सकें.

क़त्रा क़त्रा जमा की हुई मुहब्बत की बूँदों ने,
नफ़्रत ने नवाज़े हुए फफोलों को सँवार लिया,
परायों की झूठी तसल्ली के मरहम ने,
अपनों ने दिए हुए ज़ख़्मों को सहलाया.

हल की तलाश में सवालात के बवंडर,
बदलती हवा के साथ भेजे कई मुक़ामात पर,
कभी पाई शमीम, जो आई थी जवाबों को लिपटकर,
कभी लौट आए सवालात, कई और सवालात लेकर.

चंद ज़र-ए-गुल भी गए थे उस बदलती हवा के साथ,
वह भी मुल्क शादाब हुआ उनके करम से,
उन्हीं गुलों का आब-ए-हयात आया घटाओं के साथ,
मुतमइन हुआ ज़र्रा ज़र्रा वतन, उनकी बरसाई नशात से.

यह मीठे-कड़वे तज्रुबे ग़ैरमुतवक़्क़िअ तो नहीं,
यह तमाम मसाइल भी ग़ैरइख़्तियारी हैं,
इन पेचीदा हालात से रिहाई भी मुम्किन नहीं,
इन्हीं से शायद सिर्र-क़ैद-ए-हयात के फ़साने हैं.

(ग़ालिब-strong, वसीक़त-firmness, रुसवाइयाँ-disrespect, पशेमानी-repentance, तख़्लिया-solitude, मज़्रूह-wounded, हिज़्रत-migrate to a foreign land, शमीम-fragrance, ज़र-ए-गुल-pollen, शादाब-colourful, आब-ए-हयात-nectar, मुतमइन-content, नशात-happiness, ग़ैरमुतवक़्क़िअ-unexpected, मसाइल-issues, ग़ैरइख़्तियारी-unavoidable, सिर्र-क़ैद-ए-हयात-mystery of captivity of life)

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# Migration, Separation, Partition, War, Peace

02 June, 2026

• हिज़्रत


तुमसे बेहतर कौन जान सकता है,
कि क्या होता है अपनों से बिछड़ना,
मगर परायों से जुदा होना भी दर्द ही देता है,
जो आसाँ नहीं होता यूँ सहना.

पराए तो हयात का वह हिस्सा है,
जिससे भी बनता है ज़ीस्त का फ़साना,
अपनों का रवैय्या परायों से भी बेदर्द होता है,
फिर भी क्यों मायूस करता है अपनों से जुदा होना.

हिज़्रत के बाद तो बन ही जाता है,
नया रुख़, नया दौर, नया ठिकाना,
भुलाए नहीं भूलता, याद आता ही रहता है,
तर्क तिनकों वाला वतन का घोंसला पुराना.

ज़ख़्म-ओ-ग़म नवाज़े तुम्हें तुम्हारे बाशिंदों ने,
हम नावाक़िफ़ नहीं तुम्हारी वजह-ए-कोफ़्त से,
रोका न होता गर तुम्हें नामहदूद फैली वासिक़ जड़ों ने,
तुम भी न रोक पाते ख़ुद को तर्क ज़मीं करने से.

तुम्हें बातों में मगन रख यकायक न छोड़ जाएँगे,
सवाल का तसल्लीबख़्श जवाब कह कर ही विदा लेंगे,
अपनी थकान का बोझ तुम्हें दे कर न जुदा होंगे,
हमारे भीतर की घुटन भी हम अपने साथ ही ले जाएँगे.

ज़िहन में बस चुकी तल्ख़ी से कैसे जुदा होंगे,
जिगर के पार हुआ वह निश्तर कैसे भुलाएँगे,
दिल में क़ैद शोर को रिहा कैसे करेंगे,
हिज़्रत के बाद भी क्या हम सुकून पा सकेंगे.

(हिज़्रत-migrate to a foreign land, ज़ीस्त-life, तर्क-abandon, वजह-ए-कोफ़्त-source of distress, नामहदूद-unbound, वासिक़-firm, तसल्लीबख़्श-satisfactory, तल्ख़ी-bitterness, निश्तर-lancet)
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# Migration, Separation, Partition, War, Peace