05 June, 2026

• दरख़्त


जिन्होंने हमारी ज़िंदगी का हर साज़ बुना,
जिन ग़ालिब जड़ों पर हमें नाज़-ओ-फ़ख़्र है,
जिनसे है हमारे वुजूद का हर ताना-बाना,
उन्हीं की वसीक़त आज बंद बन चुकी है.

रुसवाइयों के चंद लमहात से ख़ुद को जुदा कर सकें,
पशेमानी से मज़्रूह, तख़्लिया में अश्क बहा सकें,
रंजिश के शोलों से रिहा हो, आब-ए-मुहब्बत नहा सकें,
हम दरख़्तों को मुम्किन नहीं, कि हिज़्रत कर सकें.

क़त्रा क़त्रा जमा की हुई मुहब्बत की बूँदों ने,
नफ़्रत ने नवाज़े हुए फफोलों को सँवार लिया,
परायों की झूठी तसल्ली के मरहम ने,
अपनों ने दिए हुए ज़ख़्मों को सहलाया.

हल की तलाश में सवालात के बवंडर,
बदलती हवा के साथ भेजे कई मुक़ामात पर,
कभी पाई शमीम, जो आई थी जवाबों को लिपटकर,
कभी लौट आए सवालात, कई और सवालात लेकर.

चंद ज़र-ए-गुल भी गए थे उस बदलती हवा के साथ,
वह भी मुल्क शादाब हुआ उनके करम से,
वहाँ के गुलों का आब-ए-हयात आया घटाओं के साथ,
मुतमइन हुआ ज़र्रा ज़र्रा वतन, उनकी बरसाई नशात से.

यह मीठे-कड़वे तज्रुबे ग़ैरमुतवक़्क़िअ तो नहीं,
यह तमाम मसाइल भी ग़ैरइख़्तियारी हैं,
इन पेचीदा हालात से रिहाई भी मुम्किन नहीं,
इन्हीं से शायद सिर्र-क़ैद-ए-हयात के फ़साने हैं.

(ग़ालिब-strong, वसीक़त-firmness, रुसवाइयाँ-disrespect, पशेमानी-repentance, तख़्लिया-solitude, मज़्रूह-wounded, हिज़्रत-migrate to a foreign land, शमीम-fragrance, ज़र-ए-गुल-pollen, शादाब-colourful, आब-ए-हयात-nectar, मुतमइन-content, नशात-happiness, ग़ैरमुतवक़्क़िअ-unexpected, मसाइल-issues, ग़ैरइख़्तियारी-unavoidable, सिर्र-क़ैद-ए-हयात-mystery of captivity of life)

*****
# Migration, Separation, Partition, War, Peace

02 June, 2026

• हिज़्रत


तुमसे बेहतर कौन जान सकता है,
कि क्या होता है अपनों से बिछड़ना,
मगर परायों से जुदा होना भी दर्द ही देता है,
जो आसाँ नहीं होता यूँ सहना.

पराए तो हयात का वह हिस्सा है,
जिससे भी बनता है ज़ीस्त का फ़साना,
अपनों का रवैय्या परायों से भी बेदर्द होता है,
फिर भी क्यों मायूस करता है अपनों से जुदा होना.

हिज़्रत के बाद तो बन ही जाता है,
नया रुख़, नया दौर, नया ठिकाना,
भुलाए नहीं भूलता, याद आता ही रहता है,
तर्क तिनकों वाला वतन का घोंसला पुराना.

ज़ख़्म-ओ-ग़म नवाज़े तुम्हें तुम्हारे बाशिंदों ने,
हम नावाक़िफ़ नहीं तुम्हारी वजह-ए-कोफ़्त से,
रोका न होता गर तुम्हें नामहदूद फैली वासिक़ जड़ों ने,
तुम भी न रोक पाते ख़ुद को तर्क ज़मीं करने से.

तुम्हें बातों में मगन रख यकायक न छोड़ जाएँगे,
सवाल का तसल्लीबख़्श जवाब कह कर ही विदा लेंगे,
अपनी थकान का बोझ तुम्हें दे कर न जुदा होंगे,
हमारे भीतर की घुटन भी हम अपने साथ ही ले जाएँगे.

ज़िहन में बस चुकी तल्ख़ी से कैसे जुदा होंगे,
जिगर के पार हुआ वह निश्तर कैसे भुलाएँगे,
दिल में क़ैद शोर को रिहा कैसे करेंगे,
हिज़्रत के बाद भी क्या हम सुकून पा सकेंगे.

(हिज़्रत-migrate to a foreign land, ज़ीस्त-life, तर्क-abandon, वजह-ए-कोफ़्त-source of distress, नामहदूद-unbound, वासिक़-firm, तसल्लीबख़्श-satisfactory, तल्ख़ी-bitterness, निश्तर-lancet)
*****
# Migration, Separation, Partition, War, Peace