तुमसे बेहतर कौन जान
सकता है,
कि क्या होता है अपनों
से बिछड़ना,
मगर परायों से जुदा
होना भी दर्द ही देता है,
जो आसाँ नहीं होता
यूँ सहना.
पराये तो हयात का वह
हिस्सा है,
जिससे भी बनता है ज़ीस्त
का फ़साना,
अपनों का रवैय्या परायों
से भी बेदर्द होता है,
फिर भी क्यों मायूस
कर जाता है उनसे जुदा होना.
हिज़्रत के बाद तो बन
ही जाता है,
नया रुख़, नया दौर,
नया ठिकाना,
भुलाए नहीं भूलता,
याद आता ही रहता है,
तर्क तिनकों का वतन का घोंसला
पुराना.
ज़ख़्म-ओ-ग़म नवाज़े तुम्हें
तुम्हारे बाशिंदों ने,
हम नावाक़िफ़ नहीं तुम्हारी
वजह-ए-कोफ़्त से,
रोका न होता गर तुम्हें
नामहदूद फैली वासिक़ जड़ों ने,
तुम भी न रोक पाते
ख़ुद को तर्क ज़मीं करने से.
तुम्हें बातों में
मगन रख यकायक न छोड़ जाएँगे,
सवाल का तसल्लीबख़्श जवाब कह कर ही विदा लेंगे,
अपनी थकान का बोझ तुम्हें
दे कर न जुदा होंगे,
हमारे भीतर की घुटन
भी हम अपने साथ ही ले जाएँगे.
ज़िहन में बस चुकी तल्ख़ी
से कैसे जुदा होंगे,
जिगर के पार हुआ वह
निश्तर कैसे भुलाएँगे,
दिल में क़ैद शोर को
रिहा कैसे करेंगे,
हिज़्रत के बाद भी क्या
हम सुकून पा सकेंगे.
(हिज़्रत-migrate to a foreign land, ज़ीस्त-life, तर्क-abandon, वजह-ए-कोफ़्त-source of distress, नामहदूद-unbound,
वासिक़-firm, तसल्लीबख़्श-satisfactory, तल्ख़ी-bitterness, निश्तर-lancet)
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# Migration, Separation
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