22 September, 2019

• इख़्तिताम


परवाने जलते ही रहते हैं  पैहमशमअ की आस में,
इंतिज़ार-ए-सहर में जलना मुक़द्दरहै शमा का,
अंजुमनबिखर जाती है बुझती शमअ के धुएँ में,
क्या ख़ाक ही इख़्तिताम है, हर महफ़िल-ओ-शमा-ओ-परवाने का.

(-consistently, -waiting for dawn, -fate, -assembly, -culmination)
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1 comment:

Mohan said...

बहूत खूब