19 February, 2019

• मातीची लकतरे

सोंगाड्या लावितो आग, समिधा घरच्याच जाळुनी,
खमंग शेकल्या पोळ्या, तेल आगीत ओतुनी,
पुशितो स्वतःची पातके, तयांचे रक्त शिंपडुनी,
आपले कुकर्म इतरांवर, झाला मोकळा मढुनी.

ते चाळीस, हे चारशे, तरीही मुसळ वाकडे,
आजवर कुणी रोखले, कशाचे होते वावडे,
उगा का करतात वल्गना, लादुनी बकासुराचे गाडे,
भेदी चोरतो मडकी, प्रजा फुंकती उकिरडे.

सकल ठेविले गुंडाळून, वेशीवर टांगले सारे,
कुणी घेतले सोंग, कुणी साखरेत घोरे,
वाट चुकली लेकरे, होरपळून गेले सारे,
दलाल पांघरे भरजरी, मातीची विखुरती लकतरे.
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# Nation, Revolution

26 January, 2019

• राग सरकारी


     दलबदलू थाट का यह एक मध्ययुगीन राग है। इसका विस्तार सामर्थ्य, सत्ता तथा धनलाभ को केंद्र में रखकर किया जाता है। साधारणतः वक्र दिखनेवाला यह प्रायः गायक प्रधान राग है। इस राग में श्रोताओं की भावनाएँ तथा हित वर्ज्य हैं। स्थल, काल, स्थिति तथा हेतु के अनुसार इसके आरोह व अवरोह के स्वरों को निश्चित किया जाता है। इसके गायक सदैव प्रयोगशील रहते हैं। प्राप्त स्थितिनुसार इसका गानसमय निर्धारित होता है। मंच पर विराजमान होते हुए, कंठ से स्वर निकाले बिना गायन के केवल अभिनय की अनुमति भी यह राग देता है।

     इस राग के वादी स्वर ‘सा’ (संभ्रम), ‘ग’ (गड़बड़ी), व ‘नि’ (निद्रिस्त), तथा संवादी स्वर ‘म’ (मिथ्या), ‘ध’ (धाँधली), और ‘रे’ (रफ़ा-दफ़ा) हैं। इसकी प्रत्येक बंदिश का मुख्य हेतु मिथ्या वचनों से श्रोताओं को पथभ्रष्ट कर उनमें आपसी कलह उत्पन्न करना माना गया है। श्रोताओं की हर संभव दृष्टि से कर्कश इस राग का अनुवादी स्वर ‘प’ (पलायन) है, जो गायक को विपरीत स्थितियों में पलायन में सहायक होता है।

     चुनाव से पूर्व इस राग को दृत लय और तार सप्तक में गाया जाता है। परिणाम घोषित होते-होते लय और सप्तक दोनों मध्य हो जाते हैं। पराजित गायकों के लिए इसकी पकड़ मंद्र सप्तक में विलंबित लय में गाना अनिवार्य है, अन्यथा गायकी त्यागना अपरिहार्य हो जाता है।

     ‘अवसरवादी’ घराने के सुप्रसिद्ध गायक ‘घोटालानवाज़ टोपीवाले’ रचित कुछ रचनाएँ:

पराजित ख्याल
गुनि जन की मत सुनियो सज्जन, लूट जात वह तुम्हरी रसोई,
तुमको दियत है विष का प्याला, आप वह खावे मेवा-मिठाई,
तुम दीजो बस एक बरस, मैं बन जाऊँ तुम्हरा हलवाई,
हाथ मैं जोडूँ, पाँव पडूँ मैं, तुम पर्बत, मैं तुच्छ हूँ राई।
▫▫▫▫▫
चुनावी ख्याल
गुनि जन कहते सुनो भई सज्जन, काहे रूठे हो तुम हम से,
भर देंगे हम तुम्हरी झोली, नोट करारे और बोतल से,
लदा हुआ है हमरा परचा, विकास के मीठे वचनों से,
किरपा कीजे बटन दबाकर, पावें मुक्ति सबहूँ दुख से।
▫▫▫▫▫
विजयी ख्याल
गुनि जन कहते कौन हो सज्जन, तुम्हरा दुखड़ा जानो तुम ही,
सुख तो तुम्हरे आँगन आवे, हमरी झोली भर दो तब ही,
परचा नहाया तुम्हरे आँसू, बह गई सकल विकास की स्याही,
सिमरन करते रहना हमरा, अधिक नहीं, बस पाँच बरस ही।
    
     गत कुछ दशकों में इस राग के अति-विस्तार से अन्य मधुर राग नामशेष हो चुके हैं; किंतु इतिहास में ऐसे अवसरों का उल्लेख है, जब विवश हो कर व्याकुल श्रोताओं ने ही समस्त नामशेष रागों को पुनर्जीवित किया।
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Related links:
# Republic, Independence, Freedom, Election

15 January, 2019

• मकर-संक्रांति

फ़स्ल की सरगोशी सुनाती, तराना काश्तकारी का,
गुनगुन पंछियों की देती, क़ियास मौसम-ए-बहार का,
आब-ए-रूद खिलखिला कहता, नग़्मा सुकून-ए-आबाद का,
शीरीनी पा गुड़ सी, तिल-तिल बढ़े अमन का.

(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)


(१-whispering, २-farming, ३-speculation, ४-river water, ५-satisfying prosperity, ६-sweetness, ७-peace)
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# Sankranti

04 November, 2018

• From Darkness to Light

May the world face ‘Manthana’ again,
to discover ‘Ratnas’ brilliant,
Those of love, peace and wisdom,
to be valorous, vigorous and valiant,
Justice is done promptly and truly,
sinner can no longer be defiant,
Earth is ruled by good alone,
evil no longer giant.

No one be left to be an orphan,
let each one get a lap so nurturing,
Each soul may then live and inscribe,
a beautiful verse, caring,
Feeding each belly, a sacred ritual,
the demon of hunger, an offering,
Let the world be prosperous enough,
to end poverty and suffering.

The light of knowledge may now,
light up the path to rightness,
‘Bali’ showers blessings,
farmers reap happiness,
Contented humanity yet again recites,
a gentle rhyme of kindness,
Each ‘Karma’ and sacrifice be supreme,
dictate volumes of greatness.

Wishing all readers a very Happy Deepavali and a Prosperous New Year.
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Readers may also like: (Hindi lines) https://jsrachalwar.blogspot.com/2016/10/blog-post_97.html
(Select lines from my English poetry book)

18 October, 2018

• Bless those souls, O Rama

Women crushed in wombs and in open,
humanity laid on pyre,
Mere effigies burned each year,
thoughts do still respire,
Evil sucking good and pure,
laughing out loud, an indecent satire,
Glorious once upon a time,
the nation gasps in an endless quagmire.

Masters continue to snore,
the economy stuck in a tangle,
Money continues to bully,
truth lynched by muscle,
Cruel roams around fearless,
continues to bleed the gentle,
But a handful of souls humane,
carry on fighting the battle.

Allow them to cross ‘Maryada’,
but to become ‘Purushottama’,
May each beat be gallant,
valiant be their ‘Karma’,
Each act divine,
define the real essence of ‘Dharma’,
To bring back the splendour again,
Bless those souls, O Rama.

Wishing all readers a very happy Vijaya-Dashmi.

(Vijaya-Dashmi is an Indian festival.)
(Select lines from my English poetry book)
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05 September, 2018

• आप ही से


          कई वर्ष बाद उसे बक्से से बाहर निकाला था। सावधानी व नज़ाकत से हर कोना, पट्टी, चाबी साफ़ कर, नमन कर उँगली रखी, तो निकले सुर से रोम-रोम पुलकित हो उठा। जैसी-जैसी उँगलियाँ घूमने लगीं, हार्मोनियम से सुर तो निकलने लगे; किंतु लय और धुन खो गई थीं। लगातार कोशिशों के बाद जब हार गया, तब अचानक कुछ याद आया; और सहज ही दाहिने हाथ के अँगूठे व तर्जनी से मैंने कान को चिकोटी काटी। “जब भी घमंड सिर पर सवार हो, तब स्वयं ही कान खींच लेना; अपने आप भूमि पर लौटोगे।” मेरे तबला गुरु की करारी सीख ने मुझे सँवार लिया।
          दसवीं कक्षा तक तबला की तअलीम पाने के पश्चात पढ़ाई के बढ़ते बोझ से तअलीम व रियाज़ पहले कम, और बाद में बंद हो गए। ताल से रिश्ता तो था ही; लेकिन सुरों से नाता जोड़ने की तमन्ना शेष थी। सेना में कार्यरत होते ही एक हार्मोनियम ख़रीदी, और हर छुट्टी में गुरुजी से सुरों की भी तअलीम पाना आरंभ किया।
          कान की चिकोटी का दर्द बरक़रार था। अगली छुट्टी मिलते ही गुरुजी से भेंट करने पहुँचा। गुरुजी के चरण स्पर्श किए। गुरुजी ने मेरे दोनो कंधे जकड़कर मुझे उठाते हुए पुरानी धारदार वाणी में कहा, “पूरी श्रद्धा से रियाज़ करो, गीत आप ही निकल आएँगे।” मैंने गर्दन हिलाकर आज्ञा स्वीकार की। धन्य वह गुरु, जो बिना कुछ सुने ही शिष्य को भाँपे। मैं भी ऐसा शिष्य बन धन्य हूँ, जो मीलों दूर गुरुजनों के स्मरण मात्र से नम्र होता है।

अक्षर पहला सीखा आपसे, सीखा कब क्या लिखें, न लिखें,
सीखा अक्षर बोलें कैसे, यह भी सीखा मौन कब रहें,
दाएँ सीखा, बाएँ सीखा, सीखा ध्यान बस पूर्ण में रखें,
स्वाभिमान से उठना सीखा, यह भी सीखा झुके कब रहें।

■ Teachers’ Day
(Select lines from my Hindi poetry book)
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01 July, 2018

‘हॅलो डॉक्टर’

    दस साल से भी अधिक काल की पढ़ाई, उसके पश्चात स्थैर्य पाने का कई सालों का संघर्ष, अपेक्षाओं का बोझ, और नैतिकता का पालन करने की पराकाष्ठा। इन सब अग्नि-परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने के बाद यदि डॉक्टर कुछ सुकून के पल चाहें, तो मेरी दृष्टि से अनुचित नहीं। जवाहिरों की दुकान, मल्टीप्लेक्स, आलीशान मॉल, शानदार रेस्तराँ इत्यादि जगहों पर फ़िज़ूल व्यय करते वक़्त जिन्हें ज़रा भी आपत्ति नहीं होती, उन्हें जीव और अंग बचाने वाले डॉक्टरों को लेकर नकारात्मक भाषा का प्रयोग करने से पूर्व सोचना आवश्यक है। माना, कि कुछ डॉक्टर उनकी प्रतिभा सुनियोजित ढंग से अनुचित कामों में लगाते हैं। वे उस ख़राब आम की तरह होते हैं, जिनसे समूचा डॉक्टर वर्ग ही कलंकित होता है। बचे हुए आम तो मीठे ही होते हैं, किंतु दुर्भाग्यवश लोगों के स्नेह से वंचित रह जाते हैं।

स्मरण हमारा करते हैं सब, होती जो पीड़ा तन-मन में,

पीड़ाओं का निवारण कर हम, पाते दुआएँ बदले में,
मानस कहते आस हमें बस ध्यान हमारा द्रव्यों में,
हमसे भला कोई क्या जाने, साँसें न बहती सिक्कों में।

■ Doctor’s  Day (India)

(Select lines from my Hindi poetry book)
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13 May, 2018

‘अम्मी’


ग़ौर ही नहीं किया मैंने, तुम्हारी जिद-ओ-जहद-ए-ज़िंदगी पर,
मेरी ख़ातिर मुसकान की आड़ में, छिपाई हुई कशमकश पर,
अपने अरमान भुलाए तुमने, मेरी तमन्नाओं का बहाना बनाकर,
अहमियत दी मेरे फ़ैसलों को, ख़ुद के मुअय्यन को मुल्तवी कर.

Mother’s Day
(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)

(जिद-ओ-जहद-ए-ज़िंदगी-struggle of life, कशमकश-struggle, अरमान-earnest hope, मुअय्यन-planned, मुल्तवी-adjourn)

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02 March, 2018

‘सदा-ए-फागुन’

सतरंग चढ़ते-घुलते रंगाते, मुलव्वन हर क़त्रा क़ुद्रत का,

प्यार मिलता-बढ़ता हटाता, साया नफ़्रत-ओ-रंजिश का,
कोयल सी शीरीं ज़बाँ बनती, साज़ हर तरन्नुम-ए-धड़कन का,
ओढ़ती हर साँस देखो, कैफ़-ओ-गुलाल गुल-ए-पलास का.

Holi Greetings
(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)

(सदा-ए-फागुन-call of Phagun, १-colorful, २-hatred & enmity, ३-sweet, ४-song of heartbeats, ५-elation& Gulal)
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17 February, 2018

• बहुत जान बाक़ी है बैंक घोटालों में

साँभा बोला सरदार सरदार, कई टोलियाँ आ चुकी हैं बाज़ार में,
लूट का पुराना तरीक़ा नाकाम, कॉम्पटिशन के आज के दौर में,
गाँववाले अनाज क्या देंगे ख़ाक, अकाल पड़ा है पूरे इलाक़े में,
गब्बर बोला फ़िक्र नहीं साँभा, बहुत जान बाक़ी है बैंक घोटालों में।

कालिया बोला सरदार सरदार, ताना न देना नमक के बारे में,
लंबे अरसे से खाया ही नहीं, डर है लगता मिलावट के दौर में,
आपकी दी हुई बंदूक नकली, जान जाते-जाते बची कल बैंक की लूट में,
गब्बर बोला डोंट वरी कालिया, बहुत जान बाक़ी है बैंक घोटालों में।

गब्बर ने घोटाला इतमीनान से किया, लिफ़्ट ली बसंती के ही ताँगे में,
खोज नहीं पाया गब्बर को ठाकुर, ढूँढ़ते रहे गाँववाले पचास-पचास कोस में,
कच्ची दीवार तोड़ था भागा, साँभा-कालिया के साथ मस्त है परदेस में,
ट्वीट में उसने बस इतनाही लिखा, कि बहुत जान बाक़ी है बैंक घोटालों में।
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26 January, 2018

• हम बुलबुलें हैं इसकी

उम्मीद कि अब न बहलेगा अवाम, चंद खारी बूँद-ए-ख़ास से,

जो कतराती हैं शहीद के अपनों के तसव्वुर में भी आने से,
उन बूँदों का भी हो ज़िक्र, महफ़ूज़ आम-ए-वतन हर जिनसे,
तवाज़ो हो लहू-ए-जिगर की भी, रंगा ज़मीं का ज़र्रा-ज़र्रा जिससे.

महज़ आँकड़ों से बहलाया जाता चमन को, वहाँ बेहोश बाज़ार सारे,
सदियाँ बीत गईं कम्बख़्त सुनते, झूठे वादों के नग़्मात सारे,
जाने कब हो आरज़ू-ए-इन्साफ़ पूरी, ख़त्म हों इंतिज़ार वह सारे,
डाल-डाल बसेरा सोने की चिड़िया का, हों अरमान-ए-अवाम पूरे.

(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)

(१-tears of distinguished, २-imagination, ३-common citizen, ४-respect, ५-garden, ६-unfortunate, ७-desire of justice, ८-earnest hopes of citizens)

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Related links:
# Republic, Revolution, Independence, Freedom

01 January, 2018

• Ctrl + Alt + Delete

Plenty we write, bold or small, our beginnings are so undefined,
Save we many, erase we some, but only a few get underlined,
We keep adding para and sub, oblivious of the destined,
Box of emotions, bordered by hope, doesn’t let us be undermined.

We search so desperately, to get the link desired,
We bear the loading patiently, never ever feel tired,
Often, we connect, though distant, at times link shows expired,
Refreshing site, sight we gain, ready to get again wired.

Portray we relations ample, put them in landscape view,
Some of them save the screen, while remain in the background a few,
The moment we minimise our frame, we perceive the old as new,
Scroll we frantically then, to return to the full screen view.

Sometimes we download folders, beautiful & fragrant,
Upload in return we then, views and thoughts pleasant,
Often emotionally hacked, we receive updates poignant,
Our eyes reload in quiet, to unload the tears stagnant.

Highlight some, colour some, we try to bookmark the dear,
But a few files become corrupt, leave us blank with fear,
Hidden receipts, shifting replies, create then a picture clear,
Dejected lone we feel, in the world of attachments mere.

Control we accept, everyone thinks, easy to mute we are,
Alter we pick, world believes, we can be managed by ajar,
Delete we prefer, volumes get raised, arrogant labelled we are,
A lesson learnt, we select restart, to rush back home afar.

Control we must, to reset them all, recycle those who mistreat,
Enter we should, fresh and new domain, alter our ways to treat,
Shall anything corrupt our lives, we shouldn’t hesitate to delete,
To reboot, we first need to opt for all three, Control, Alter, Delete.

(Select lines from my English poetry book)
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# New Year

09 December, 2017

• होमी व्यारावाला

क़ैद हुई हर अदा-ए-ख़ास, आपकी माहिर अक्कासी में,
नक़्श बन वह तस्वीरें बस गईं, तमाम दिल-ए-‘जवाहर’ में,
हुए मुलव्वन पल-ए-माज़ी वह सारे, रंग सियाह-ओ-सफ़ेद,
आपकी शख़्सियत मिसाल-ए-तहसीन आज भी, बसारत-ए-मुआशरा में.
■ Homai Vyarawalla’s 104th birthday
(Homai Vyarawalla was India's first woman photojournalist.)

(अदा-ए-ख़ास-mannerisms of famous, अक्कासी-photography, नक़्श-impression, दिल-ए-‘जवाहर’-heart of gem like people (ref: Jawaharlal Nehru, मुलव्वन-colourful, पल-ए-माज़ी-past moment, सियाह-ओ-सफ़ेद-black & white, मिसाल-ए-तहसीन-example of admiration, बसारत-ए-मुआशराह-view of society)
*****

22 November, 2017

• रुख्माबाई राऊत

विजय तुझा होणेच होते, तनया तू ‘जयंती’ची,

मायेचा खंबीर आधार, ‘सख्या’ची साथ ही मोलाची,
अनामिकाच राहून उघडलीस, कवाडे संकीर्ण मनांची,
धन्य तुझ्या लढ्याने, इंच-इंच न्यायगृहाची।

कणखर तू, संयमी, साहसी, खाण तू धैर्य जिद्दीची,
साता समुद्रापारही फडकली, निशाणे अतुल प्रतिभेची,
झुगारले ऐश्वर्य सकळ, करिण्या सेवा मायभूची,
ललनांची प्रेरणा तू, अस्मिता अनुपम राष्ट्राची।

रुख्माबाई राऊत यांचा वाढदिवस
(Rukhmabai Raut is best known for being one of the first practicing women doctors in colonial India as well as being involved in a landmark legal case involving her marriage as a child bride.)
*****

14 November, 2017

‘सूराख़-ए-सुकून’

यूँ तो बेचैन रहता हर शख़्स-ए-मुआशरा, ख़ौफ़-ए-सूराख़ से,
मगर जाविदाँ हुआ लफ़्ज़-ए-सफ़हा हर, तुमने नवाज़े सादा सूराख़ से,
कहीं मुसकान पढ़ पल-ए-माज़ी, कोई रोया दस्तावेज़-ए-वफ़ात से,
हर शोअबा-ए-ज़िंदगी आबाद, तुम्हारे हुनर-ए-‘सूराख़’ से.
■ 131st anniversary of the ‘Hole Puncher’
(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)
(सूराख़-ए-सुकून-defect of satisfaction, शख़्स-ए-मुआशरा-individual from society, जाविदाँ-immortal, लफ़्ज़-ए-सफ़हा-word from page, पल-ए-माज़ी-past, दस्तावेज़-ए-वफ़ात-documents of death, शोअबा-ए-ज़िंदगी-section of life, हुनर-ए-‘सूराख़’-art of creating defect)
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07 October, 2017

• बेगम अख़्तर

तनहाई भी हुई बेनज़ी, सदा-ए-मलिका-ए-ग़ज़ल से,
जहाँ-ए-मूसीक़ी है रोशन, आफ़ताब-ए-दादरा से,
मुतमइन बज़्म-ए-मुम्ताज़, आब-शार-ए-ठुमरी से,
है गूँजता हिंदोस्ताँ आज भी, तरन्नुम-ए-‘अख़्तरी’ से.

■ यौम-ए-विलादत

(ख़िराज-ए-तहसीन)

(१-unique, २-sun of Dadra, ३-assembly of distinguished, ४-melody of Akhtari- maiden name of Begum Akhtar was Akhtaribai Faizabadi, ५-birthday, ६-tribute)
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02 October, 2017

• आता कसं सांगू बापू तुमाले

गाड्या हाटेलं बुक झाले सरवे, पाय ठेवाले जागा नाइ उरली,
गुरवारच्याच रात्री सारायनं, समदी यवस्था करून ठेवली,
ब्यागा भरून दारातंच मांडल्या, आफिस सामोरंच गाडी लागली,
सारायची खुशी उतू गेली काउन का जयंतीची सुट्टी रईवारले जोडून भेटली,
बरं झालं का लई आधीच, तुमी वरतं निंगून गेले,
जमलं नसतं तुमच्याच्यानं, आजचा गोंधड बगाले समजाले,
आंधळे जात्यावर दळूनंच राहले, कुत्रे पीठ खाऊनंच राहले,
आज का का हून राहलं, आता कसं सांगू बापू तुमाले.
तुमच्या लेखनी नं सुताच्या धाकानं, गोरे चाल्ले गेल्ते भेऊन,
पन जाताना हात बी जोडले, तुमच्या खर्‍याची जादू बगून,
त्यायनं त्यायचा देश घडंवला, डोंगर खर्‍याखर्‍याचा रचून,
आमी आमचंच दिवाळं फुकलं, खोट्याखोट्या तंद्रीत र्‍हाऊन,
लोकाजवडं झाकाले कापडं नाई, म्हनून तुमी बी सादेच राहले,
आज दुसर्‍याले उघडं पाडते, लोकं सवताचे पापं झाकाले,
खाऊन पिऊन बी तोंड आमचं वाकडं, लाखाचं नेसून येते रडाले,
शिकवनीचं तुमच्या गाठोडं बांधलं, आता कसं सांगू बापू तुमाले.
गोर्‍यानं परिषद भरवली त्याले, तुमी पंचाच नेसून गेल्ते,
तुमाले तशा अवतारात बगून, घोंगडीत बी गोरे कुडकुडले व्हते,
आज मोठ्या घरातलं पावनं, येकाच कापडात गुमान राहते,
उधारीचे कापडं घडीघडी बदलू, झोपडीतला सोंगाड्या मिजास दाखवते,
झोपडीच्या छपराचे शेद्रं सरवे, दिसूनंच जाते मोठ्या पावन्याले,
थो बी मंग लई इतरते, सोंगाड्याचे लेकरं धरून वेठीले,
सोंगाड्यानं देल्लं वार्‍यावरतं सोडून, कोटं जावं लेकरानं पोट भराले,
उघडे नं पोरके झाले लेकरं, आता कसं सांगू बापू तुमाले.
पइले तुमच्या येकट्याच्याच उपासानं, घाम सुटून जाय गोर्‍याले,
आज उपाशी लेकराइचा कल्ला बी, ऐकाची फुरसत नाइ कोनाले,
तुमी सरवे तुकडे जवडं आनले, सोबत घेऊघेऊ जोडलं सारायले,
आज करूकरू तुहं नं माहं, सारायनं वाटून टाकलं देशाले,
खुर्चीसाठी समदे पगले व्हते, कमी नाइ करंत मारा कापाले,
वावरात कास्तकार मेले कित्ती गी, डोळे कोनाचेच व्हंत नाइ वले,
कोनाचंच काडिज हालंत नाइ जर्रा, जवान किती बी रगंत न्हाले,
मानसाले मानुस पारखं झालं, आता कसं सांगू बापू तुमाले.
तुमी म्हनलं का सहन करा, पन किती करा हे नाइ बोलले,
काटा काट्यानंच काढा लागते, हे बी शिकवनं इसरून गेले,
पइले व्हतं ते गोर्‍याइनं लुटलं, आज आपलेच लुबाडुन राहले,
तवा बोलाची सोय नव्हती, आज बी भेवंच लागते सांगाले,
बगन्या ऐकन्या बोलन्या सोबत, करू बी नका वाईट सांगाले,
तिघा वानरासोबत चवथा, बसवाले तुमी भुलुनंच गेले,
त्याच चवथ्याच्या मस्ती तंद्रीनं, काडी लावली सारायच्या घरट्याले,
पुरं जंगल भाजूभाजू करंपलं, आता कसं सांगू बापू तुमाले.
सारायचे खिसे वलेवले गच्चं, पन माह्या पिकाले थेंब नाइ जिरला,
किरकेटच्या डावाले पाटातलं पानी, वाटूवाटू डाव माहाच संपून गेला,
सरवे मेट्रो नं बुलेटच्याच मांगं, जुन्या पटरीले वालीच नाई उरला,
गोटे रंगूरंगू दीस गेला संपून, गटारं झाकाले वेळंच नाइ भेटला,
जो बी येते थो हेच म्हनते, का थोच आता तारंल सारायले,
समदे मडके घेऊन पसार होते, बाकिच्याले लाउन उकरडे फुकाले,
कोनाच्या जवडं गार्‍हानं गावं, समजूनंच नाइ राहलं कोनाले,
सारायनंच झोपेचं सोंग घेतलं, आता कसं सांगू बापू तुमाले.
पन आता भेउन चालनार नाइ, धरावाच लागंन खर्‍याचा रस्ता,
घर सावडाले तुमी लिवलं, तस्संच वागा लागंन आता,
घरच्याच मातीच्या इटा उभ्या करून, पावन्याले झुकवा लागंन आता,
मातीतनं धूर सोन्याचा काढाले, लोकालेच नळी फुका लागंन आता,
ह्या पंचाइतीत नुस्कानीचा मार, झेलाच लागंन थोडाथोडा सारायले,
आमाले काइ नाइ भेटलं तरी, लेकराले तं मिळंल चांगलं भोगाले,
आमचं आमालेच निस्तरा लागते, म्हनून सांगनारंच नव्हतो तुमाले,
पन राहवलंच नाइ सांगितल्या बिगंर, आता कसं सांगू बापू तुमाले.
(गांधी जयंती)
(वर्‍हाडी अभिवादन)
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# Mahatma Gandhi