वजह का मरज़ जानकर महसूस हुआ, कि तक्लीफ़ दोनों को है। शख़्स ने उसकी तक्लीफ़ अब तक सरे आम बयाँ नहीं की थी, और वजह ने पहली बार
ही ज़िक्र किया था। बड़ा मुश्किल था पहचानना, कि किसे ज़्यादा दर्द है। मेरी बेचैनी जान
वजह ने ख़ुद ही कहा-
यूँ तो किसीके अश्क-ओ-ग़म कम नहीं हुआ करते,
उनके बहें तो सैलाब, हमारे बहें तो क़ियामत ही
आ जाए.
(अश्क-ओ-ग़म-tears & grief, सैलाब-flood, क़ियामत-doom)
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