22 May, 2020

• Wise and Silly


Mind wanders every dusk,
heart still soaked in memories,
The wounds bleed incessant,
ceaseless seem to be agonies,
The busy world will never hear,
cries of the shattered or the miseries,
How could wise and prudent fathom,
the pain that a silly soul carries.

(Select lines from my English poetry book)
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20 May, 2020

• शीरीं-ओ-शादाब

तपती ख़ुश्क फ़ज़ा सँभलती, सुन कोयल की शीरीं बहर,
मायूस चहचहों की हौसलाअफ़्ज़ाई, करता क़िर्मिज़ी गुलमोहर,
बेज़ार शाम को सुकून दिलाती, जाफ़री गुलों की चादर,
शब्बो सहलाती बेक़रार शब, शमीम में लिपटी सहर.

(शीरीं-ओ-शादाब-sweet & colourful, शीरीं-sweet, बहर-poem, हौसलाअफ़्ज़ाई-morale boosting, क़िर्मिज़ी-red, जाफ़री-yellow, शमीम-fragrance, सहर-dawn)
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# Indian Summer

19 May, 2020

• Yellow caress

Bloom stands undaunted,
Defying the scorch merciless,
Dense and green rescue,
The breaths wandering the wilderness,
White unveils the yellow,
A respite for love in distress,
Parted souls feel relieved,
By the tender fragrant caress.

(Select lines from my English poetry book)
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# Indian Summer

16 May, 2020

• Summer solace

The morning brightness rejuvenates,
The desolate twigs lazy,
Fresh tender innocent shoots,
Teased by the fragrance breezy,
The rays play hide and seek,
Through those few leaves plucky,
Thin silver clouds console the lake,
And the pied cuckoo thirsty.

(Select lines from my English poetry book)
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14 May, 2020

• ग्रीष्म

शाखांवर पहुडली पीतसुमने, दडले हरित अंतरी,
कनक ल्याला बाहवा, ऐश्वर्य उधळितो अंबरी,
दरवळे उत्कट पुष्पगंध, जागवी प्रणय-लहरी,
नटून सुखवितो आसमंत, असे ग्रीष्म तीक्ष्ण जरी।

(Select lines from my Marathi poetry book)
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# Indian Summer

23 April, 2020

• किताब

     कपड़ों की ख़रीदारी पूरी कर सदानंद और कुमार किताबों की एक बड़ी दुकान पहुँचे। कुमार को किसी ख़ास इम्तिहान की पढ़ाई की ख़ातिर जो किताबें चाहिए थीं, उनमें से सिवा एक के सारी उसी दुकान में मिल गईं। दुकान-मालिक ने कहा, कि वह शायद ही कहीं मिल पाए। “ठीक है, फ़िलहाल इन्हीं को पढ़ो, बची हुई बाद में ढूँढ़ लेंगे।” सदानंद ने कुमार का हौसला बढ़ाते हुए कहा। दोनों दुकान के बाहर लौटे ही थे, कि यकायक सदानंद को कुछ याद आया। उसने उलटे रुख़ की ओर कार मोड़ी, और एक घने पेड़ की छाँव में फ़ुटपाथ पर जमी किताब की एक छोटीसी दुकान के सामने रोकी। ‘पेपर फ़्री ऑफ़िस’ और इंटरनेट के दौर में औरों की तरह सदानंद का भी किताबें ख़रीदना और पढ़ना न के बराबर हो गया था। कई सालों बाद वह यहाँ लौटा था। जब तक कुमार किताबें खोजता, सदानंद दुकान-मालिक से बात-चीत करने लगा। “गुज़ारा हो जाता है इतने में?” सदानंद ने पूछा। दुकानदार बोला, “बस, जैसे-तैसे चल जाता है।” ऊँचे ढेरों में किताबों को खोजना कुमार के लिए मुश्किल होता देख सदानंद मदद के लिए बढ़ा। बड़ी कोशिशों बाद कुमार को तो किताब न मिल पाई; मगर सदानंद को कई दिनों से जिसकी तलाश थी, उस मज़्मून से मिलती-जुलती किताब मिल गई। “क्या क़ीमत?” सदानंद ने ख़ुश होकर पूछा।

     बरसों पहले जब सदानंद यहाँ आया करता, तब बोली हुई क़ीमत से आधी में ख़रीदने में फ़ख़्र महसूस करता था; मगर आज तक़ाज़ा-ए-उम्र ने उसे मोल-तोल की इजाज़त नहीं दी। उसने ख़ुश होकर दुकानदार को मुँह-बोली रक़म अदा की। एक मुद्दत बाद सदानंद ने कोई पुरानी किताब ख़रीदी थी।

सादा कवर में महफ़ूज़ किताब, सहारा थी भीड़ के तनहा पलों में,
सहलाता था अलफ़ाज़ का तरन्नुम, मुआशरा के शोर-ओ-गुल में,
कभी मुसकुराहट, कहीं ठहाके, दफ़अतन् नमी भी आई पलकों में,
जाने कितनों के मुख़्तलिफ़ जज़्बात, आज भी दर्ज हैं पुराने पन्नों में.

 World Book Day
(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)

(१-subject, २-maturity by age, ३-safe, ४-words, ५-song, ६-society, ७-sudden, ८-various)
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22 April, 2020

• पृथ्वी

सज्जनों कहीं ऐसा न हो, तुम्हारी जय-पराजय में,
मैं जीवन ही हार जाऊँ, तुम्हारी प्रतिष्ठा की लड़ाई में,
रक्त चाहे जिसका बहे, दूषित तो भूमि ही होगी अंत में,
कैसे श्वास ले सकोगे, कंकालों की भय-सभा में।

अब तो जागो सज्जनों, अभी भी मुझमें जीवन शेष हैं,
मेरी मृत्यु के पश्चात तो, तुम्हारे बस अवशेष ही हैं,
आनंद लो, सम्मान भी करो, तुम मुझसे, मेरे कण तुमसे हैं,
आवाहन करो मुरली के, उसके स्वर अब उदास हो चले हैं।

(Select lines from my Hindi poetry book)

■ Earth Day
■ World Environment Day
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05 April, 2020

• शब्द

कितने ही देखे रिश्ते, बिन शब्द के ही बनते,
शब्द के प्रलय में कुछ, टूटते अटूट रिश्ते,
धुन झूठ की कितनी ही गाओ, पराए अपने न बनते,
क्षमा एक मौन सच्ची, न्योछावर सर्वस्व होते।
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22 March, 2020

• बूँद


     बचपन में बारिश और भीगना अतिप्रिय था। हेतुतः घर में रेनकोट भूलना, और पाठशाला से लौटते समय भीगना किसी युद्ध जीतने का आनंद देता। आई-बाबा की डाँट के डर पर भी यह लालच भारी ही पड़ता। युवावस्था आते-आते अन्य चीज़ों के साथ-साथ बारिश और भीगने की परिभाषा में भी बदलाव आया। जिनमें भीगने से कभी प्रफुल्लित होता था, उन्हीं से भीगने में अब उत्कटता महसूस होने लगी। कभी जिन्हें हथेली पर ले उठते तुषारों सा खिलखिलाता था, उन्हीं को अब हथेली से उछाल किसी की स्मृति का गीत गाता था।

     ‘सृष्टि’ की तरह ‘बूँद’ और प्रकृति से जुड़ी मेरी अन्य रचनाएँ भी मुझे अपूर्ण लगती हैं। परिस्थिति के अनुसार बूँदों की प्रस्तुति चाहे भिन्न हो, किंतु अभिव्यक्ति हमेशा मनोरम ही रहती है। कामना यही है, कि सृष्टि के प्रेम की बूँदें यूँ ही अविरत बरसती रहें।


लाल हरे और नीले पीले, रंग जीवन में सुंदर सारे,
इंद्रधनुष की धुन में ठुमकते, जीने के सुर प्यारे-प्यारे,
निर्मल जल बन जाते पल में, एक बूँद में जब हों सारे,
एक बूँद में ही मैं भिगोऊँ, विभोर करती सारी फुहारें।

■ World Water Day
(Select lines from my Hindi poetry book)
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09 March, 2020

• फागुन

भस्म हों रिपु समस्त, मानस मुक्त हो भय से,
होलिकानल पावन हो, आहुति हर श्रेष्ठ से,
धधके हर स्पंदन अब, तिमिर नष्ट हो हृदय से,
प्रकाशमान होती हर दिशा, फागुन की ज्वाला से।

रंग चढ़ें, घुलें भी, सजे हर कण सृष्टि का,
मिले स्नेह, बढ़े भी, अंत हो कलह, द्वेष का,
कोकिल सी वाणी मधुर, बने साज़ हर श्वास का,
हृदय हर परिधान करे, गुलाल उत्कट पलाश का।

फागुन पूर्णिमा और धुलेंडी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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08 March, 2020

• परवाज़-ए-निस्वाँ

करो तर्क मायूसी ज़िहन की, रहो न अब तुम नातवाँ,
महज़ उफ़क़ न हो मंज़िल, लाँघो हुदूद-ए-कहकशाँ,
पाओ मराहिल यूँ मुन्फ़रिद, कि बने हर वतन रश्क-ए-जिनाँ,
लिखे इस्तिलाह-ए-फ़राज़ अब, हर परवाज़-ए-निस्वाँ.

■ International Women’s Day

(१-weak, २-horizon, ३-bounds of galaxy, ४-goals, ५-unique, ६-envied even by heaven, ७-definition of height, ८-flight of women)
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15 February, 2020

• मिर्ज़ा ग़ालिब

तमन्ना-ए-ज़र न छुई आपको, न ख़्वाहिश अल्क़ाब-ओ-ताज की,
आलम ने किया एहतिराम-ए-ज़बाँवुस्अत-ए-हुनर थी आपकी,
बेक़रार पाते हैं सुकून ज़ीनत-ए-लफ़्ज़ से, आसूदा हर साँस बेचैन की,
बेनज़ीर मअना-ए-अलफ़ाज़ बढ़ाते, रौनक़ हर शाम-ए-अंजुमन की.

 यौम--वफ़ात
(ख़राज-ए-अक़ीद)

(-desire of wealth, -titles & crown, -honour of language, -extent of talent, -satisfied, -meaning of words, -an evening assembly, -death anniversary, -tribute)

Related link: (Marathi article about Mirza Ghalib) https://jsrachalwar.blogspot.com/2019/12/blog-post_13.html
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14 February, 2020

• कारण

    समाज में बंधनों के साथ जीना और बढ़ना होता है। किसने, कब और क्यों यह बंधन डाले, यह कोई नहीं जानता। चाहे प्रेम की हो, द्वेष या फिर नाराज़गी की; स्त्रियों को इन भावनाओं को व्यक्त करने के बंधनों में तनिक शिथिलता है; किंतु पुरुषों को किसी स्त्री के प्रति प्रेम तो दूर, आस्था जताने की भी स्वायत्तता बड़ी कंजूसी से मिलती है।

    जिस व्याकुलता का प्रेमी और प्रेमिका को अब तक केवल एहसास था, उसे शब्दों में कहना अब अनिवार्य था; किंतु पहल कौन करे? शर्मसार होती प्रेमिका को झिझक ने बेबस कर दिया था। अंततः प्रेमी ने अभिव्यक्ति के सारे बंधनों को तोड़ प्रेमिका से ‘कारण’ कह ही डाला। जो अब तक व्याकुलता के आवरण से ढँके थे, उन समर्पित भावों को सुन प्रेमिका सराबोर हो गई।

प्राची का गुलाल थी या, अस्त की उद्विग्नता तुम,

होरी की ज्वाला थी या फिर, रुधिर की थी लालिमा तुम,
स्नेह की प्रतिमा थी या फिर, कपोल की थी रक्तिमा तुम,
तुम ही जीवन, श्वास मेरे, थी मेरी संवेदना तुम।

■ Valentine's Day

(Select lines from my Hindi poetry book)
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30 January, 2020

• शहीद

ख़राज-ए-अक़ीदत चंद लमहात का, उफ़ वह सजी सँवरी गोई,
बेरंग तंज़ीम सुर्ख़ियाँ बटोरने, दौड़ी-दौड़ी चली आई,
तस्वीर पर चढ़े फूलों को कुचल, अंजुमन भी घर लौट गई,
यतीम साँसों को आज भी तवक़्क़ुअ, इंतिज़ार में जिनकी उम्र बीत गई.

■ Martyrs’ Day

(Select lines from my Hindi-Urdu poetry book)

(१-tribute, २-speech, ३-organisation, ४-assembly, ५-orphan, ६-hope)

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Related link: (English poem) https://jsrachalwar.blogspot.in/2017/01/29-martyrs-day.html

26 January, 2020

• गणतंत्र

हो पदच्युत कलंकित, हटे मुखौटा छद्मी नेतृत्व का,
सिंहासनों के द्वंद्व में किंतु, पतन न हो गरिमा का,
अब न हो दमन शोषण, सत्य शांति क्षमा का,
बीते मधुर में खो, विस्मरण न हो कटु वास्तव का।

व्यर्थ न हो बलिदान, हो सम्मान हर समिधा का,
देश का हर श्वास हो अब, उदाहरण निःस्वार्थ का,
भेद अब न हो धर्मों में, होता पूजन कर्मों का,
स्वतंत्र, निडर, स्वच्छंद हो अब, कण-कण गणतंत्र का।
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23 January, 2020

• ख़ता

ज़माने भर के आब-ए-हराम का, पैहम सुना है शिकवा हुस्न से,
निशाँ-ए-हुस्न होते आए हैं रुसवा, दाइमन् ज़ालिम ज़माने से,
क़ुसूर आब-ए-इशरत का नहीं, उल्फ़त पशेमाँ मुद्दत से जिससे,
ख़ता ज़िहनियत का है, जो मुसल्सल मुतअस़्स़िर कैफ़ से.

(१&५-liquor, २&७-repeatedly, ३-defame, ४-consistently, ६-ashamed, ८-driven)
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15 January, 2020

• Makar-Sankranti


May the harvest be enough,
To feed the abandoned hunger,
Sweetness will fill the heart,
To eliminate and conquer anger,
The sunshine of knowledge,
Building our thoughts brighter,
Each life, now a colourful canvas,
With bonds of humanity stronger.

Pray this spring the breeze,
Carry the fragrance of kindness,
To the land of sorrow and grief,
Battered by violence by the ruthless,
The chirping, gentle shall recite,
A verse of fortune and fondness,
May we prosper as humane,
And reach the horizons of happiness.

Greetings
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Related links:

(Select lines from my English poetry book)

27 December, 2019

• मिर्जा गालिब

    काळ बरेच लोक गाजवतात, पण त्यातील मोजकेच हृदयावर नाव गोंदतात. मिर्जा गालिब असेच एक विलक्षण व्यक्तिमत्त्व. आपल्या अलौकिक लेखणीच्या किमयेने रसिकांच्या हृदयांवर चिरकाल अधिराज्य गाजविणारा अनभिषिक्त सम्राट.

    ऊरी अपत्यवियोगाचे दुःख बाळगून आणि मुगल विरुद्ध इंग्रज संघर्षयुगीन उलथापालथ पाहून वयाच्या अवघ्या अकराव्या वर्षापासून काव्यरचना करणार्‍या मिर्जांचे कविमन हेलावले नसते तरच नवल होते. मिर्जांना त्या काळी बटबटीत शृंगारावरच भर असलेली शायरी मुळीच आणि कधीही रुचली नाही. मार्मिक विनोद साधून ते त्या शायरीच्या उथळपणावर उघडउघड टीका देखील करीत असत. त्यांनी देखील शृंगारावर आधारित रचना लिहिल्या, पण त्यात थिल्लरपणाला सक्त मज्जाव होता. त्यांच्या अशा रचना म्हणजे अभिजात व निर्व्याज प्रेमाची हळुवार आणि दर्जेदार अभिव्यक्ती होती. प्रेमाचे गूढ पण अतिरम्य वर्णन त्यांच्या शायरीत आढळते. तत्त्वज्ञान आणि जीवनविषयक मूल्य यांना मिर्जांनी त्यांच्या लेखनात स्थान देऊन उर्दू शायरीला एक निराळे आणि मानाचे स्वरूप दिले. आयुष्यात बेतलेले आणि बघितलेले दुःख त्यांच्या शायरीत अनेकदा डोकावते. प्रथमदर्शनी समजण्यास अवघड वाटणारे गालिबचे लिखाण बारकाईने वाचले असता उमजू लागते आणि अक्षरशः वेड लावते. शूर मर्दाचा पोवाडा खुद्द शूराच्याच स्वरात ऐकल्यानंतर इतर शौर्यगीते जशी रुचत नाहीत, तसेच एकदा गालिब वाचले की इतर रचना औषधास देखील कुणी बाळगत नाही. पत्रलेखनातदेखील मिर्जांचीच मक्तेदारी होती. असे म्हणतात, की त्यांची पत्रे वाचणार्‍यांना प्रत्यक्ष गालिब बोलल्याचा भास होत असे. गालिबच्या चीजा घोळवून रसिकांपर्यंत पोहचविण्याचा अट्टाहास कित्येक लोकांनी केला; पण ते शिवधनुष्य तोलणे केवळ बेगम अख्तर सारख्या दिग्गजांनाच साध्य झाले. हीर्‍याला सोन्याचेच कोंदण हवे.

   उर्दूला एक सन्मानजनक आणि आगळेवेगळे रूप बहाल करून साहित्य जगतात मानाचे स्थान मिळवून देण्यात मोलाचा वाटा असलेल्या मिर्जांना आदरांजली वाहण्यास लेख जरी मराठीत लिहिला, तरी पूर्णविराम उर्दूने देण्याचा मोह अनावर होतोय.

तमन्ना-ए-ज़र न छुई आपको, न ख़्वाहिश अल्क़ाब-ओ-ताज की,

आलम ने किया एहतिराम-ए-ज़बाँ, वुस्अत-ए-हुनर थी आपकी,
बेक़रार पाते हैं सुकून ज़ीनत-ए-लफ़्ज़ से, आसूदा हर साँस बेचैन की,
बेनज़ीर मअना-ए-अलफ़ाज़ बढ़ाते, रौनक़ हर शाम-ए-अंजुमन की.

Mirza Ghalib’s Birthday

(१-desire of wealth, २-titles & crown, ३-honour of language, ४-extent of talent, ५-satisfied, ६-meaning of words, ७-an evening assembly)
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26 December, 2019

• बाबा आमटे

हर ठुकराई हुई रूह को, सँवारा पनाह-ओ-इल्म से,
बियाबाँ भी खिल उठा, ‘आनंदवन’ के गुलों से,
न ख़िताब-ओ-ताज का ग़ुरूर, न बहले आप शुहरत से,
क़ाइम है वुजूद-ए-इन्सानियत, आप की सी इमदाद से.

आज़ादी-ए-वतन की ख़ातिर चले, राह-ए-अदम-ए-तशद्दुद पर,
इम्तियाज़ को दी शिकस्त, इन्सानियत को अपनाकर,
मुहब्बत और तवाज़ो कमाई, बेशुमार दौलत ठुकराकर,
निशाँ बनाए सरमद१०, ‘दाग़’-ए-नफ़्रत११ मिटाकर.

■ Baba Amte’s Birthday

(१-shelter and knowledge, २-jungle, ३-title & crown, ४-established, ५-existence of humanity, ६-contribution, ७-path of non-violence, ८-discrimination, ९-respect, १०-immortal, ११-patch (of leprosy) of hatred)
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24 December, 2019

• कशमकश

मुसल्सल मुक़ाबला दिल-ओ-ज़िहन के दरमियान,
सिलसिला-ए-ज़ीस्त बना है आग़ाज़-ए-फ़साना से,
दिल की ख़ातिर धड़कने का सबब है दर्द की दास्तान,
कशमकश करे ज़िहन, मिटाने हर्फ़-ए-दर्द हिकायत से.

(१-consistent, २-order of life, ४-struggle, ५-an alphabet of pain, ३&६-story)
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22 December, 2019

• तश्वीश

एहसान तअस़्स़ुर-ए-तसव्वुर का, जिसने सँभाली तनहाई मुद्दत से,
हमनफ़स जो बना रहा दाइमन्, पल-ए-आग़ाज़-ए-फ़साना से,
तश्वीश, कि क्या हो अंजाम, जो मुजस्सम हो चंद लमहात गुज़रे से,
हौसला ग़ालिब न रहा माज़ी सा, कैसे पाएँगे नजात सैलाब से.

(-influence of imagination, -consistent, -apprehension, -actual, -strong)
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21 December, 2019

• क्रांती

होईल का शंखनाद गगनभेदी, खेचण्या तख्त कलंकित,
भडकेल का दावानल, घेरून अहंकारी अनुचित,
अन्याय व अधमांशी झुंजण्या, रयत होईल का प्रेरित,
तळपता क्रांतिसूर्य करेल का, सुप्त चेतना प्रज्वलित।

(Select lines from my Marathi poetry book)
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# Revolution

19 December, 2019

• बँटवारा

ख़फ़गी सरहदों से क्यों बेवजह,
उनसे तो होती है महज़ नक़्शे में तरमीम,
ख़ता तल्ख़ ख़यालात का,
मुतअस़्स़िर है जिससे मुद्दत से मुहब्बत समीम,
लकीरों से बनाए निशाँ ज़मीं पर मगर,
कैसे बाँटोगे आब-ओ-हवा की शमीम,
छेड़ी दिल-ओ-ज़िहन के बँटवारे ने,
जाने कब तक चलेगी यह जंग-ए-तक़्सीम.

(१-displeasure, २-amendment, ३-bitter, ४-affected, ५-unadulterated, ६-fragrance, ७-battle of division)
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# Partition, International

16 December, 2019

• गुंता

जन्मास येई प्रत्येक जीव, देऊन गर्भातल्या गुंत्यास लढा,
श्वास पणास लावितो जीव, सोडविण्या प्राक्तनातला तिढा,
निराश करी आपुलेच प्रतिबिंब किंतु, देई धैर्य ही पार करण्या ओढा,
ओघळ आयुष्याचे शोधिती वाटा, भेदून असंख्य स्मृतींचा वेढा।

(Select lines from my Marathi poetry book)

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