A collection of promotional pages of my poetry books, poems, stories and articles
22 May, 2020
• Wise and Silly
20 May, 2020
• शीरीं-ओ-शादाब
19 May, 2020
16 May, 2020
14 May, 2020
23 April, 2020
• किताब
कपड़ों की ख़रीदारी पूरी कर सदानंद और कुमार किताबों की एक बड़ी दुकान पहुँचे। कुमार को किसी ख़ास इम्तिहान की पढ़ाई की ख़ातिर जो किताबें चाहिए थीं, उनमें से सिवा एक के सारी उसी दुकान में मिल गईं। दुकान-मालिक ने कहा, कि वह शायद ही कहीं मिल पाए। “ठीक है, फ़िलहाल इन्हीं को पढ़ो, बची हुई बाद में ढूँढ़ लेंगे।” सदानंद ने कुमार का हौसला बढ़ाते हुए कहा। दोनों दुकान के बाहर लौटे ही थे, कि यकायक सदानंद को कुछ याद आया। उसने उलटे रुख़ की ओर कार मोड़ी, और एक घने पेड़ की छाँव में फ़ुटपाथ पर जमी किताब की एक छोटीसी दुकान के सामने रोकी। ‘पेपर फ़्री ऑफ़िस’ और इंटरनेट के दौर में औरों की तरह सदानंद का भी किताबें ख़रीदना और पढ़ना न के बराबर हो गया था। कई सालों बाद वह यहाँ लौटा था। जब तक कुमार किताबें खोजता, सदानंद दुकान-मालिक से बात-चीत करने लगा। “गुज़ारा हो जाता है इतने में?” सदानंद ने पूछा। दुकानदार बोला, “बस, जैसे-तैसे चल जाता है।” ऊँचे ढेरों में किताबों को खोजना कुमार के लिए मुश्किल होता देख सदानंद मदद के लिए बढ़ा। बड़ी कोशिशों बाद कुमार को तो किताब न मिल पाई; मगर सदानंद को कई दिनों से जिसकी तलाश थी, उस मज़्मून१ से मिलती-जुलती किताब मिल गई। “क्या क़ीमत?” सदानंद ने ख़ुश होकर पूछा।
22 April, 2020
• पृथ्वी
(Select lines from my Hindi poetry book)
05 April, 2020
• शब्द
22 March, 2020
• बूँद
‘सृष्टि’ की तरह ‘बूँद’ और प्रकृति से जुड़ी मेरी अन्य रचनाएँ भी मुझे अपूर्ण लगती हैं। परिस्थिति के अनुसार बूँदों की प्रस्तुति चाहे भिन्न हो, किंतु अभिव्यक्ति हमेशा मनोरम ही रहती है। कामना यही है, कि सृष्टि के प्रेम की बूँदें यूँ ही अविरत बरसती रहें।
09 March, 2020
• फागुन
08 March, 2020
• परवाज़-ए-निस्वाँ
15 February, 2020
• मिर्ज़ा ग़ालिब
■ यौम-ए-वफ़ात८
(ख़राज-ए-अक़ीदत९)
(१-desire of wealth, २-titles & crown, ३-honour of language, ४-extent of talent, ५-satisfied, ६-meaning of words, ७-an evening assembly, ८-death anniversary, ९-tribute)
14 February, 2020
• कारण
समाज में बंधनों के साथ जीना और बढ़ना होता है। किसने, कब और क्यों यह बंधन डाले, यह कोई नहीं जानता। चाहे प्रेम की हो, द्वेष या फिर नाराज़गी की; स्त्रियों को इन भावनाओं को व्यक्त करने के बंधनों में तनिक शिथिलता है; किंतु पुरुषों को किसी स्त्री के प्रति प्रेम तो दूर, आस्था जताने की भी स्वायत्तता बड़ी कंजूसी से मिलती है।
जिस व्याकुलता का प्रेमी और प्रेमिका को अब तक केवल एहसास था, उसे शब्दों में कहना अब अनिवार्य था; किंतु पहल कौन करे? शर्मसार होती प्रेमिका को झिझक ने बेबस कर दिया था। अंततः प्रेमी ने अभिव्यक्ति के सारे बंधनों को तोड़ प्रेमिका से ‘कारण’ कह ही डाला। जो अब तक व्याकुलता के आवरण से ढँके थे, उन समर्पित भावों को सुन प्रेमिका सराबोर हो गई।
प्राची का गुलाल थी या, अस्त की उद्विग्नता तुम,
■ Valentine's Day
30 January, 2020
• शहीद
■ Martyrs’ Day
(१-tribute, २-speech, ३-organisation, ४-assembly, ५-orphan, ६-hope)
Related link: (English poem) https://jsrachalwar.blogspot.in/2017/01/29-martyrs-day.html
26 January, 2020
• गणतंत्र
23 January, 2020
• ख़ता
(१&५-liquor, २&७-repeatedly, ३-defame, ४-consistently, ६-ashamed, ८-driven)
15 January, 2020
• Makar-Sankranti
27 December, 2019
• मिर्जा गालिब
काळ बरेच लोक गाजवतात, पण त्यातील मोजकेच हृदयावर नाव गोंदतात. मिर्जा गालिब असेच एक विलक्षण व्यक्तिमत्त्व. आपल्या अलौकिक लेखणीच्या किमयेने रसिकांच्या हृदयांवर चिरकाल अधिराज्य गाजविणारा अनभिषिक्त सम्राट.
ऊरी अपत्यवियोगाचे दुःख बाळगून आणि मुगल विरुद्ध इंग्रज संघर्षयुगीन उलथापालथ पाहून वयाच्या अवघ्या अकराव्या वर्षापासून काव्यरचना करणार्या मिर्जांचे कविमन हेलावले नसते तरच नवल होते. मिर्जांना त्या काळी बटबटीत शृंगारावरच भर असलेली शायरी मुळीच आणि कधीही रुचली नाही. मार्मिक विनोद साधून ते त्या शायरीच्या उथळपणावर उघडउघड टीका देखील करीत असत. त्यांनी देखील शृंगारावर आधारित रचना लिहिल्या, पण त्यात थिल्लरपणाला सक्त मज्जाव होता. त्यांच्या अशा रचना म्हणजे अभिजात व निर्व्याज प्रेमाची हळुवार आणि दर्जेदार अभिव्यक्ती होती. प्रेमाचे गूढ पण अतिरम्य वर्णन त्यांच्या शायरीत आढळते. तत्त्वज्ञान आणि जीवनविषयक मूल्य यांना मिर्जांनी त्यांच्या लेखनात स्थान देऊन उर्दू शायरीला एक निराळे आणि मानाचे स्वरूप दिले. आयुष्यात बेतलेले आणि बघितलेले दुःख त्यांच्या शायरीत अनेकदा डोकावते. प्रथमदर्शनी समजण्यास अवघड वाटणारे गालिबचे लिखाण बारकाईने वाचले असता उमजू लागते आणि अक्षरशः वेड लावते. शूर मर्दाचा पोवाडा खुद्द शूराच्याच स्वरात ऐकल्यानंतर इतर शौर्यगीते जशी रुचत नाहीत, तसेच एकदा गालिब वाचले की इतर रचना औषधास देखील कुणी बाळगत नाही. पत्रलेखनातदेखील मिर्जांचीच मक्तेदारी होती. असे म्हणतात, की त्यांची पत्रे वाचणार्यांना प्रत्यक्ष गालिब बोलल्याचा भास होत असे. गालिबच्या चीजा घोळवून रसिकांपर्यंत पोहचविण्याचा अट्टाहास कित्येक लोकांनी केला; पण ते शिवधनुष्य तोलणे केवळ बेगम अख्तर सारख्या दिग्गजांनाच साध्य झाले. हीर्याला सोन्याचेच कोंदण हवे.
उर्दूला एक सन्मानजनक आणि आगळेवेगळे रूप बहाल करून साहित्य जगतात मानाचे स्थान मिळवून देण्यात मोलाचा वाटा असलेल्या मिर्जांना आदरांजली वाहण्यास लेख जरी मराठीत लिहिला, तरी पूर्णविराम उर्दूने देण्याचा मोह अनावर होतोय.
तमन्ना-ए-ज़र१ न छुई आपको, न ख़्वाहिश अल्क़ाब-ओ-ताज२ की,
26 December, 2019
• बाबा आमटे
24 December, 2019
22 December, 2019
• तश्वीश
21 December, 2019
19 December, 2019
• बँटवारा
(१-displeasure, २-amendment, ३-bitter, ४-affected, ५-unadulterated, ६-fragrance, ७-battle of division)

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